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Thursday, April 16, 2020

राग पुरिया धनाश्री का परिचय

राग पुरिया धनाश्री का परिचय
वादी: प
संवादी: सा
थाट: PURVI
आरोह: ऩिरे॒गम॓पध॒निसां
अवरोह: सांनिध॒पम॓गरे॒सा
पकड़: म॓रे॒गप, रे॒ऩिध़॒प़
रागांग: पूर्वांग
जाति: SAMPURN-SAMPURN
समय: Day का T桩牤 प्रहर

राग पुरिया का परिचय

राग पुरिया का परिचय
वादी: ग
संवादी: ऩि
थाट: MARWA
आरोह: ऩिरे॒सागम॓धनिरें॒सां
अवरोह: सांनिध॒म॓गम॓गरे॒सा
पकड़: ऩिरे॒गऩिरे॒सा, गम॓धगम॓ग, निम॓गरे॒सा
रागांग: पूर्वांग
जाति: SHADAV-SHADAV
समय: Day का T桩牤 प्रहर

राग परज का परिचय

राग परज का परिचय
वादी: सां
संवादी: प
थाट: PURVI
आरोह: ऩिसागम॓ध॒निसां
अवरोह: सांनिध॒प, म॓पध॒पगमग, म॓गरे॒सा
पकड़: सांरे॒सांरे॒निध॒नि, ध॒पगमग, म॓पध॒पगमग
रागांग: उत्तरांग
जाति: AUDAV-SAMPURN
समय: Night का T桩牤 प्रहर

राग मारवा का परिचय

राग मारवा का परिचय
वादी: रे॒
संवादी: ध
थाट: MARWA
आरोह: सारे॒गम॓धनिधसां
अवरोह: सांनिधम॓गरे॒सा
पकड़: धम॓गरे॒गम॓गरे॒सा
रागांग: पूर्वांग
जाति: SHADAV-SHADAV
समय: Day का T桩牤 प्रहर

राग ललित का परिचय

राग ललित का परिचय
वादी: म
संवादी: सा
थाट: MARWA
आरोह: ऩिरे॒गमम॓गम॓धसां
अवरोह: रें॒निध, म॓धमम॓ग, मगरे॒सा
पकड़: ऩिरे॒गमम॓ग, धम॓मग
रागांग: उत्तरांग
जाति: SHADAV-SHADAV
समय: Night का T桩牤 प्रहर

राग छायानट का परिचय

राग छायानट का परिचय
वादी: प
संवादी: रे
थाट: KALYAN
आरोह: सारेगमपनिधसां
अवरोह: सांनिधपम॓पधपमगरेसा
पकड़: प़प़रेसा, सारे, रेग, गम, मप, नि॒धपरे
रागांग: पूर्वांग
जाति: SAMPURN-SAMPURN
समय: Night का F楲獴 प्रहर

राग भैरव का परिचय

वादी: ध़॒
संवादी: सा
थाट: BHAIRAV
आरोह: सारे॒गमपध॒निसां
अवरोह: सांनिध॒पमगरे॒सा
पकड़: रे॒रे॒गमनिध॒पमरे॒सा
रागांग: उत्तरांग
जाति: SAMPURN-SAMPURN
समय: दिन का प्रथम प्रहर 

राग बसन्त का परिचय

राग बसन्त का परिचय
वादी: सां
संवादी: प
थाट: PURVI
आरोह: सागम॓ध॒रें॒सां
अवरोह: रें॒निध॒प, म॓ग, म॓गरे॒सा
पकड़: म॓ध॒सां, म॓ध॒रें॒सां
रागांग: उत्तरांग
जाति: SHADAV-SAMPURN
समय: रात्रि का तृतीय प्रहर

Friday, March 27, 2020

राग

राग
 योऽयं ध्वनिविशेषस्तु स्वरवर्णविभूषित:।
रंजको जनचित्तानां स राग: कथ्यते बुधै:।।

अर्थात् स्वरों की रचना जिसमें स्वर और वर्ण के युक्त होने के कारण मनुष्य के तित्त की रंजन या उसमें आनन्द विकसित हो, उसे राग कहते हैं।

वक्र-स्वर

वक्र-स्वर 
आरोह अथवा अवरोह करने के समय जब किसी स्वर तक जाकर पुनः लौटकर उसके पीछे के स्वर पर आते हैं और फिर उसको छोड़कर आगे बढ़ते हैं तब जिस स्वर से लौटते हैं, उसी स्वर को वक्र स्वर कहते हैं।
जैसे : सा रे ग रे म
यहाँ गांधार वक्र हैं।

पकड़-स्वर

पकड़-स्वर 
ऐसे स्वर-समुदाय जिससे किसी राग को पहचाना जाता है, उसे पकड़ कहते हैं, जैसे : "ग रे नि रे सा" कहने से यमन राग का बोध होता है।

तान

तान
येन विस्तार्यते रागः स तानः कथ्यते बुधैः । 
शुद्धकूटविभेदेन द्विविधास्ते समीरिताः ।। 

गाने या बजाने में जो सरगम नियमित रूप से ताल में गाये-बजाये जाते हैं, उन्हीं तानों और सरगमों को सितार पर दिरदादिर दारा आदि बोल के सहारे बजाने से तोड़े बनते हैं।  तान दो तरह के होते हैं- शुद्ध तान और कूट तान।


झाला

झाला 
सितार में चिकारी के तार पर कनिष्टिका या तर्जनी "रा रा" बजने को झाला कहते हैं।  इसके कुछ अलग बोल हैं।  यह ठीक भ्रमर के गुंजन के सामान मीठा और अच्छा मालूम होता है और नृत्य का आनंद मिलता है।

गत

गत 
बोलो की बंदिश जो स्वर और ताल में बंधी हो, उसे गत कहते हैं।  इन बोलों के कुछ भी मायने नहीं होते परन्तु हस्त चालन द्वारा निर्देशित स्वर और ताल के मिश्रण को सुनने में आनंद आता है। 

सितार पर स्वरों के सहारे और ताल में बंधी हुई दा दिर दा रा, दिरदादिरदारा आदि बोलों की बंदिश जो राग और ताल पर बंधी होती है, उसे गत कहते हैं। 

Thursday, February 27, 2020

राग बिहाग एवं राग खमाज में तुलना

राग बिहाग एवं राग खमाज
समानता :
  • दोनों रागों में ग वादी और नी सम्वादी माना गया है। 
  • दोनों राग रात्रि के प्रथम प्रहार में गाये जाते हैं। 
  • दोनों के अवरोह में सभी शुद्ध स्वर लगते हैं। 
  • दोनों का अवरोह सम्पूर्ण है। 
विभिन्नता :
राग बिहाग  राग  खमाज
यह बिलावल  थाट का राग है। यह राग खमाज थाट का राग है। 
यह आश्रय राग नहीं है। यह राग खमाज थाट का आश्रय राग है। 
यह औडव-सम्पूर्ण जाति का राग है। यह राग षाडव - सम्पूर्ण जाति का राग है। 
बिहाग में तीव्र मध्यम का प्रयोग बहुत अधिक होने लगा है जबकि यह विवादी स्वर है। इस राग में ख्याल और ध्रुपद गाते समय किसी विवादी स्वर का प्रयोग नहीं होता है। 
इस राग में ठुमरी नहीं गाये जाते हैं। इस राग में ठुमरी गायी जाती है। 

जाति किसे कहते हैं? जातियां कितने प्रकार की हैं, समझाइये।

जाति - इससे राग में प्रयोग किये जानेवाले स्वरों की संख्या का ज्ञान होता है।  किसी भी राग में कम से कम ५ और अधिक से अधिक ७ स्वर प्रयोग किये जाते हैं। स्वरों की संख्या की दृस्टि से मुख्य तीन प्रकार के राग हो सकते हैं:

  • ५ स्वर वाले राग - ऐसे रागों की जाति को औडव कहा जाता है। 
  • ६ स्वर वाले राग - ऐसे रागों की जाति को षाडव कहा जाता है। 
  • ७ स्वर वाले राग - ऐसे रागों की जाति को सम्पूर्ण कहा जाता है। 
राग में आरोह एवं अवरोह दोनों आवश्यक होते हैं।  कुछ रागों में यह देखा जाता है की आरोह एवं अवरोह में लगने वाले स्वरों की संख्या सामान नहीं होती।  जैसे - राग खमाज के आरोह में ६ और अवरोह में ७ स्वर प्रयोग किये जाते हैं।  इस तरह अन्य राग भी हैं, जिनमे यदि आरोह में ५ स्वर प्रयोग किये जाते हैं तो अवरोह में ६ अथवा ७ स्वर प्रयोग किये जाते हैं।  

इस प्रकार रागों की तीन जातियों को मिलकर ३x ३=९ जातियां होती हैं, जिनके नाम इस प्रकार हैं:
  1. औडव - औडव : आरोह एवं अवरोह दोनों में ५-५ स्वर। 
  2. औडव - षाडव  : आरोह में ५ एवं अवरोह में ६ स्वर। 
  3. औडव - सम्पूर्ण : आरोह में ५ एवं अवरोह में ७ स्वर। 
  4. षाडव - षाडव   : आरोह एवं अवरोह दोनों में ६-६ स्वर। 
  5. षाडव - औडव : आरोह में ६ एवं अवरोह में ५ स्वर। 
  6. षाडव - सम्पूर्ण : आरोह में ६ एवं अवरोह में ७ स्वर। 
  7. सम्पूर्ण - सम्पूर्ण : आरोह एवं अवरोह दोनों में ७-७ स्वर। 
  8. सम्पूर्ण - षाडव : आरोह में ७ एवं अवरोह में ६ स्वर। 
  9. सम्पूर्ण - औडव : आरोह में ७ एवं अवरोह में ५ स्वर।  

राग किसे कहते हैं? राग के नियम अथवा लक्षण बताइये।

राग - स्वरों की वह सुन्दर रचना जो कानों को अच्छी लगे उसे राग कहते हैं. आजकल राग गायन हीं प्रचार में है. संगीत रत्नाकर में राग की परिभाषा इस प्रकार दी गयी है
'स्वर और वर्ण से विभूषित ध्वनि जो मनुष्य के मन का रंजन करे, राग कहलाता है'

राग में निम्न बातों का होना  आवश्यक है:
  • राग के नियम - प्रत्येक राग में रञ्जकता अर्थात मधुरता आवश्यक है, अर्थात कानों को अच्छा लगना आवश्यक है। 
  • राग में कम से कम ५ और अधिक से अधिक ७ स्वर होने चाहिए। 
  • प्रत्येक राग किसी न किसी थाट  से उत्पन्न माना गया है। 
  • किसी भी राग में षडज अर्थात सा कभी-भी वर्जित नहीं होता, क्यूंकि यह सप्तक का आधार स्वर होता है। 
  • प्रत्येक राग में म और प में से कम से कम एक स्वर अवश्य होना चाहिए।  दोनों स्वर एक साथ वर्जित नहीं हो सकते।  यदि पंचम के साथ शुद्ध म भी वर्जित हो तो तीव्र-म अवश्य रहना चाहिए। 
  • प्रत्येक राग में आरोह अवरोह, वादी-सम्वादी, पकड़, समय आदि होना चाहिए। 
  • किसी भी राग में एक स्वर का दोनों रूप अर्थात शुद्ध-कोमल एक साथ नहीं प्रयोग होना चाहिए।