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Saturday, February 9, 2019

वर्ण : परिभाषा

गाने की प्रत्यक्ष क्रिया या स्वरों की विविध चलन को वर्ण कहते हैं. ये चार प्रकार के होते हैं। अभिनव राग मंजरी में कहा गया है, "गान क्रियोच्यते वर्ण:" अर्थात् गाने की क्रिया को वर्ण कहते हैं।

१. स्थाई वर्ण - जब कोई स्वर एक से अधिक बार उच्चारित किया जाता है तो उसे स्थायी वर्ण कहते हैं, जैसे - रे रे, ग ग ग, म म म आदि।
२. आरोही वर्ण - स्वरों के चढ़ते हुये क्रम को आरोही वर्ण कहते हैं जैसे- सा रे म ग प ध नी
३. अवरोही वर्ण - स्वरों के उतरते हुये क्रम को अवरोही वर्ण कहते हैं जैसे - नि ध प म ग रे सा

  • ४. संचारी वर्ण - उपर्युक्त तीनों वर्णों के मिश्रित रूप को संचारी वर्ण कहते हैं । इसमें कभी तो कोई स्वर ऊपर चढ़ता है तो कभी कोई स्वर बार-बार दोहराया जाता है। दूसरे शब्दों में संचारी वर्ण में कभी आरोही, कभी अवरोही और कभी स्थाई वर्ण दृष्टिगोचर होता है जैसे - सा सा रे ग म प प म ग रे सा।

विवादी : परिभाषा

जिस स्वर को राग में लगाने से राग का स्वरुप बिगड़ जाये, अर्थात  राग में न प्रयोग किए जाने वाले स्वरों को विवादी कहते हैं. इसे राग का शत्रु भी कहते हैं. प्रचार में यह वर्ज्य या वर्जित स्वर कहलाता है.
कभी-कभी राग की सुंदरता बढ़ाने के लिए विवादी स्वर का क्षणिक प्रयोग भी किया जाता है ऐसा करते समय बड़ी सावधानी की आवश्यकता होती है अन्यथा राग के बिगड़ने की संभावना रहती है।
१. विवादी स्वर का उपयोग उस समय करना चाहिए जबकि राग के रंजकता में वृद्धि हो। केवल प्रयोग के लिए प्रयोग न करना चाहिए अन्यथा राग हानि होगी। बिहारग में तीव्र म विवादी स्वर है विवादी स्वर के प्रयोग करने से राग हानि नहीं होती बल्कि उसके गलत प्रयोग करने से राग हानि अवश्य होती है।
२. विवादी स्वर का अल्प प्रयोग होना चाहिए। ऐसा न करने से विवादी अनुवादी हो जाएगा।
३. विवादी के प्रयोग से राग का मूल स्वरूप किसी भी अंश में नहीं बिगड़ना चाहिए।

अनुवादी : परिभाषा

वादी और संवादी को छोड़कर बाद की नियमित स्वरों को अनुवादी कहते हैं. इन्हें राग का सेवक कहते हैं.
 उदाहरण के लिए भैरवी राग में म-सा के अतिरिक्त जो क्रमशः वादी-संवादी हैं, राग के शेष स्वर अनुवादी कहलाते हैं। अनुवादि स्वरों को अनुचर या सेवक कहा गया है।
राग यमन में वादी ग, संवादी नी और शेष स्वर - सा रे तिव्र-म, प, ध स्वर अनुवादी हैं।
राग खमाज में ग-वादी, नी-संवादी और शेष स्वर - सा, रे, ग, प और ध अनुवादी हैं।


The notes in a raga that neither Vadi nor, Samvadi are called Anuvadi notes. They are often called companion notes.

आभोग : परिभाषा

गाने के चौथे पद को आभोग कहते हैं. इसका रूप अंतरे से कुछ भिन्न होता है.

संचारी : परिभाषा

गाने के तीसरे पद को संचारी कहते हैं. इस पद से स्थाई के ऊपर वाले भाग का विशेष बोध होता है.

अंतरा : परिभाषा

गाने के दुसरे पद को अंतरा कहते हैं. यह पद मध्य-सप्तक से आरम्भ होकर तार-सप्तक के मध्य तक जाता है.

स्थाई : परिभाषा

गाने के प्रथम पद को स्थाई कहते हैं. इसमें राग का स्पष्ट रूप प्रकट हो जाता है और तार-सप्तक के स्वरों का उपयोग कम होता है.

गमक : परिभाषा

स्वरस्य कम्पो गमक: श्रोतृचित्तसुखावह:।


सितार में गमक मिठास उत्पन्न करने के लिए एक उत्तम क्रिया है। मींड, जमजमा, मुर्की एवं गिटकिड़ी आदि सभी गमक के हीं प्रकार हैं। परन्तु जब किसी स्वर की श्रुतियों को उससे आगे-पीछे की श्रुतियों में इस प्रकार मिला दिया जाये की आगे-पीछे के स्वर सुनाई न देकर, जिस स्वर पर यह क्रिया कर रहे हैं, केवल वही स्वर सुनाई दे तो इस क्रिया को गमक कहते हैं. 

नीचे स्वर से हिलते हुये ऊंचे स्वर पर जाने से गमक होता है।  यह दो स्वरों से उत्पन्न होता है, और मीड़ के सहीरे बजाया जाता है। 
गमक ७ प्रकार के होते हैं -
स्फुरितं कम्पितं लीनं स्तिमितांदोलितावपि
आहतं त्रिकभिन्नं च सप्तैते गमक: स्मृता।।


गिटकिड़ी : परिभाषा

सितार वादन में मुर्की बजाते हुए जब अंत में मध्यमा अंगुली से जमजमा की भांति किसी स्वर पर प्रहार किया जाता है तो मिजराब के एक हीं ठोकर से चार स्वर की ध्वनि सुनाई देती है जैसे की 'रेसानिसा'

मुर्की : परिभाषा

सितार वादन में जब एक हीं मिजराब के ठोकर में बिना मींड के तीन खरे स्वर बजाये जाएँ तो इस क्रिया को मुर्की कहते है. जैसे 'रेसानी'. इस क्रिया में रे पर मिजराब से ठोकर देते समय तर्जनी सा और मध्यमा रे के परदे पर रहेगी. रे पर मिजराब लगते हीं मध्यमा को तुरंत तार पर से उठाने से 'रेसा' की ध्वनि उत्पन्न होगी, एवं तर्जनी तुरंत घसीट कर नि के परदे पर पहुँचाने से 'रेसानी' की ध्वनि सुने देगी. 

जमजमा : परिभाषा

सितार वादन में किसी भी स्वर पर तर्जनी द्वारा बाज के तार को दबाकर उससे अगले परदे पर मध्यमा अंगुली को जोर से मरने पर जिस स्वर पर मध्यमा पड़ेगी, उसी स्वर की हल्की ध्वनि उत्पन्न होगी. इसे बजाने में दुसरे स्वर पर मिजराब द्वारा ठोकर नहीं दी जाएगी बल्कि केवल मध्यमा ऊँगली से दुसरे स्वर के परदे पर प्रहार की जाएगी. जब इस क्रिया को एक या अधिक बार किया जाता है तो इसे जमजमा कहते हैं.

कृन्तन : परिभाषा

इसकी यन्त्र संगीत में प्रयोग होता है। यह दो, तीन, चार स्वर से उत्पन्न होता है। यह एक स्वर का सम्बन्ध दूसरे स्वर से बनाये रखता है। ऊंचे स्वर से नीचे स्वर पर आने से दो आवाज होती है, उसे कृन्तन कहते हैं।  सितार वादन में मिजराब के एक हीं ठोकर में दो-तीन अथवा चार स्वरों को बिना मींड के केवल अँगुलियों के सहायता से निकलने की क्रिया को कृन्तन कहते हैं. कृन्तन में स्वरों की संख्या चार से अधिक भी हो सकती है.

विलोम मींड : परिभाषा

यदि सा के परदे पर पूर्व में हीं बिना तार को ठोकर दिए इतना खिंच जाये की आघात होने पर रे का स्वर सुने परे और फिर खींचे हुए तार को धीरे-धीरे ढीला करते हुए वापस सा के परदे पर आ जाने से सा का स्वर सुने पड़ने लगे तो ऐसे अवरोही क्रम में रे से सा की ध्वनि उत्पन्न हो तो इसे विलोम मींड कहते हैं. इस प्रकार की मींड में तार खीचने के बाद मिजराब से ठोकर दी जाति है.

अनुलोम मींड : परिभाषा

यदि सा पर मिजराब लगाकर दूसरी ऊँगली को रे पर न ले जाकर उसी सा के परदे पर हीं तार को इतना खींची जाय की रे का स्वर सुने देने लगे इस प्रकार आरोही के लिए खिंची गयी मींड को अनुलोम मींड कहते हैं. इस क्रिया में सा से रे की ध्वनि पहुंचने में ध्वनि कहीं भी खंडित नहीं होती है. 

मींड : परिभाषा

सितार में ही नहीं बल्कि समस्त भारतीय संगीत में मींड एक महत्वपूर्ण क्रिया है. संगीत में मिठास उत्पन्न करने वाली इस जैसी कोई अन्य क्रिया नहीं है. जब सितारवादक एम् ऊँगली से सा पर रखकर मिजराब लगते हैं और दूसरी ऊँगली से रे बजाते हैं अर्थात दोनों स्वरों पर ठोकर देकर बजाते हैं तो इसे खड़ा स्वर बजाना कहते हैं. किन्तु यदि एक स्वर पर मिजराब द्वारा ठोकर देने के बाद दुसरे स्वर की ध्वनि निकाली जाये तो इसे मींड कहते हैं.

Wednesday, February 6, 2019

राग यमन विशेष

Raga yaman - by NCERT Official


Raga yaman and Bollywood songs


Raga yaman - Alap on Sitar

Friday, January 25, 2019

तन्त्र वाद्य - चतुर्थ वर्ष (सीनियर डिप्लोमा)

चतुर्थ वर्ष (सीनियर डिप्लोमा)


क्रियात्मक 
  1. पिछले वर्षों के पाठ्यक्रमों का विशेष अभ्यास. स्वर-ज्ञान, लय-ज्ञान और राग-ज्ञान में निपुणता.
  2. वाद्य मिलाने का पूर्ण अभ्यास.
  3. अंकों या स्वरों के सहारे ताली देकर विभिन्न लयों का प्रदर्शन जैसे-दुगुन (१ मात्रा में २ मात्रा बोलना), तिगुन (१ में ३), चौगुन (१ में ४), आड़ (२ में ३), आड़ का उल्टा (३ में २), पौनगुन (४ में ३), सवागुन (४ में ५)
  4. गिटकिरी, मुर्की, खटका, कण, कृन्तन, जमजमा, लाग-डाट, घसीट आदि बजने का अभ्यास. कुछ कठिन मींड जैसे = जमजमा की मींड, मुर्की की मींड, गिटकिरी की मींड, सूत की मींड आदि निकालना.
  5. सुन्दर आलाप, जोड़ और झाले का विशेष अभ्यास.
  6. केदार, पटदीप, जैजैवंती,पुरिया, मारवा, कामोद, दरबारी-कान्हड़ा,, अड़ाना तथा देशकार रागों का पूर्ण-ज्ञान और प्रत्येक में एक-एक राजखानी गत या छोटा ख्याल सुन्दर आलाप, कठिन तान, तोड़ों, और झाला सहित.
  7. केदार, तोड़ी, मुल्तानी, पुरिया और दरबारी कान्हड़ा रागों का पूर्ण आलाप-जोड़ तथा एक-एक मसितखानी गत या बड़ा ख्याल कठिन और सुन्दर तान तोड़ों सहित.
  8. टप्पा और ठुमरी के ठेकों का साधारण ज्ञान. जत और आड़ा-चारताल का पूर्ण ज्ञान और इनको विभिन्न लयों में ताल देकर बोलना.
  9. बजाकर रागों में समता-विभिन्नता दिखाना.
  10. छोटे-छोटे स्वर-समूहों द्वारा राग पहिचान.


शास्त्र

  1. राग-रागिनी पद्धति, तान के विभिन्न प्रकारों का विस्तृत वर्णन विवादी स्वर का प्रयोग, निबद्ध गान के प्राचीन प्रकार (प्रबंध-वास्तु आदि) धातु, अनिबाध गान, अध्वदर्शक स्वर.
  2. २२ श्रुतियों का स्वरों में विभाजन (आधुनिक और प्राचीन-मतों का तुलनात्मक अध्ययन), खींचे हुए तार की लम्बाई का नाद के ऊँचे-निचेपन से सम्बन्ध.
  3. छायालग और संकीर्ण राग, परमल प्रवेशक राग, रागों का समय-चक्र, कर्नाटकी और हिन्दुस्तानी सन्गिईत पद्धतियों के स्वरों की तुलना. राग का समय निश्चित करने में वादी-संवादी, पूर्वांग, उत्तरांग और अध्वदर्शक-स्वर का महत्व.
  4. उत्तर भारतीय सप्तक से ३२ थाटों की रचना. आधुनिक थाटों के प्राचीन नाम, अल्पत्व-बहुत्व, तिरोभाव तथा आविर्भाव.
  5. रागों का तुलनात्मक अध्ययन, राग का स्वर-विस्तार लिखने तथा राग पहिचान में निपुणता.
  6. विभिन्न तालों की दुगुन, तिगुन तथा चौगुन प्रारंभ करने का स्थान गणित द्वारा निकलने की विधि विभिन्न लायकारियों को ताल-लिपि में लिखने का अभ्यास जैसे-दुगुन (१ मात्रा में २ मात्रा बोलना), तिगुन (१ में ३), चौगुन (१ में ४), आड़ (२ में ३), आड़ का उल्टा (३ में २), पौनगुन (४ में ३), सवागुन (४ में ५)
  7. विष्णु दिगंबर और भातखंडे दोनों स्वर्लिपियों का तुलनात्मक अध्ययन. दोनों स्वर्लिपियों में आलाप, गत, तान, तोड़ा, झाला लिखने के अभ्यास.
  8. विभिन्न भारतीय वाद्यों (तत्, वितत्, घन और सुषिर) का विस्तृत वर्णन और उनका इतिहास. वाद्यों को बजने की विभिन्न बैठक तथा उनके गुण और दोष. वाद्य मिलाने के विभिन्न प्रकार. मसितखानी और रजाखानी गत बजाने के नियम. विभिन्न तन्द्रा वाद्यों (सितार, सरोद, इसराज, बेला, सारंगी, वीणा) की विशेषताएं.
  9. निम्नलिखित शब्दों की परिभाषाएं - लाग-डाट, पुकार, लड़गुथाव, छूट, तार-परन, कृन्तन.
  10. भरत, अहोबल, व्यंकटमखी तथा मानसिंह तोमर का जीवन परिचय तथा संगीत कार्य.

तन्त्र वाद्य - तृतीय वर्ष

तृतीय वर्ष (तन्त्र वाद्य)
क्रियात्मक परीक्षा १०० अंकों की तथा शास्त्र का एक प्रश्न-पत्र ५० अंकों का. पिछले वर्षों का सम्पूर्ण पाठ्यक्रम भी सम्मिलित है.

क्रियात्मक 


  1. प्रथम और द्वितीय वर्षों की पाठ्यक्रम की विशेष जानकारी और तैयारी.
  2. स्वर-ज्ञान में विशेष उन्नति.
  3. अन्य कठिन अलंकारों और तानों को विभिन्न लयकारियों (ठाह, दून, तिगुन, और चौगुन) में विभिन्न बोलों में और तीनों सप्तकों में पूर्ण अभ्यास. आड़-लय का केवल प्रारंभिक ज्ञान.
  4. वाद्य मिलाने का प्रारंभिक अभ्यास.
  5. मींड, सूत, घसीट, जमजमा, खटका, मुर्की, स्पर्श, स्वर आदि निकालने का आरंभिक अभ्यास. प्रथम और द्वितीय वर्ष के रागों के स्वर-विस्तार में इन सब चीजों का साधारण प्रयोग.
  6. बागेश्री, मालकोस, जौनपुरी, तथा पूर्वी, रागों का साधारण आलाप, जोड़, और एक-एक विलंबित गत मसितखानी अथवा बड़ा-ख्याल (ख्याल-अंग बजाने वालों के लिए) दून और चौगुन लयों में सुन्दर तान, तोड़ों, सहित. हाथ की सफाई और तैयारी पर विशेष ध्यान रखना चाहिए.
  7. पूर्वी, तोड़ी, मुल्तानी, दुर्गा, कलिंङ्गड़ा, तिलङ, पीलू, तिलक कामोद, और सोहिनी रागों का पूर्ण-ज्ञान, स्वर विस्तार (साधारण और मींड-सूत द्वारा) और प्रत्येक में एक-एक रजाखानी-गत अथवा छोटा-ख्याल सुन्दर तान, तोड़ों और झाला सहित.
  8. दीपचंदी, धमार, झुमरा तथा तिलवाड़ा तालों के ठेकों को ठाह, दुगुन, तिगुन और चौगुन लयों में बोलना.
  9. राग पहचान में निपुणता.


शास्त्र

  1. प्रथम और द्वितीय वर्षों के कुल पारिभाषिक शब्दों का विस्तृत ज्ञान, २२ श्रुतियों का सात शुद्ध स्वरों में विभाजन (आधुनिक मत), आन्दोलन की चौड़ाई और उसका नाद से छोटे-बड़ेपन से सम्बन्ध, थाट और राग के विशेष नियम. श्रुति और नाद में सूक्ष्म भेद. व्यंकटमखी के ७२ मेलों की गणितानुसार रचना और एक थाट से ४८४ रागों की उत्पत्ति. स्वर और समय के अनुसार रागों के तीन वर्ग (रे-ध कोमल वाले राग, रे-ध शुद्ध वाले राग, और ग-नि कोमल वाले राग), संधिप्रकाश राग, तानों के प्रकार.
  2. वाद्य सम्बन्धी पारिभाषिक शब्दों एवं विषयों का पूर्ण ज्ञान, तरब, जोड़, अनुलोम तथा विलोम, मींड, गमक, सूत, घसीट, मुर्की, गिटकिरी, खटका, तंत्र, तन्त्रकारों के गुण-दोष, कस्बी तथा अताई.
  3. रागों का पूर्ण परिचय एवं तुलनात्मक अध्ययन स्वर-विस्तार सहित.
  4. आलाप, गत, तान तोड़ा, झाला आदि को स्वरलिपि में लिखने का पूर्ण अभ्यास.
  5. इस वर्ष तथा पिछले वर्षों के तालों का पूर्ण ज्ञान. उनके ठेकों को दुगुन, तिगुन और चौगुन लयों में ताल-लिपि में लिखना. किसी ताल अथवा गत या गीत को दुगुन आदि आरंभ करने के स्थान को भिन्न-भिन्न स्थानों द्वारा निकालने की रीति.
  6. कठिन स्वर-समूहों द्वारा राग पहिचान.
  7. भातखंडे तथा विष्णु दिगंबर स्वर-लिपि पद्धतियों का पूर्ण-ज्ञान.
  8. शारङदेव तथा स्वामी हरिदास को संक्षिप्त जीवनियां तथा उनके संगीत कार्यों का परिचय.


Friday, January 4, 2019

Ghunghroo for indian classical dance


अलंकार : परिभाषा

स्वरों की नियमानुसार  चलन को अलंकार कहते हैं. अलंकार में कई कड़ियाँ होती हैं जो आपस में एक दूसरे से जुड़ी होती है. प्रत्येक अलंकार में मध्य सा से तार सा तक आरोही वर्ण और तार सा के मध्य सा तक अवरोही वर्ण हुआ करता है. 'संगीत दर्पण' के अनुसार इसकी परिभाषा इस प्रकार दी गई है:
'विशिष्ट वर्ण सन्दभम् लंकार प्रचक्षते'
अर्थात नियमित वर्ण-समूह को अलंकार कहते हैं. अलंकार का अवरोह, आरोह का ठीक उल्टा होता है, जैसे:-
आरोह - सारेग, रेगम, गमप, पधनी, धनिसा.
अवरोह - सानिध, निधप, धपम, पमग, मगरे, गरेसा.
इसी प्रकार अनेक अलंकारों की रचना हो सकती है. अलंकार को पलटा भी कहते हैं.