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Thursday, April 16, 2020
राग ललित का परिचय
राग ललित का परिचय
वादी: म
संवादी: सा
थाट: MARWA
आरोह: ऩिरे॒गमम॓गम॓धसां
अवरोह: रें॒निध, म॓धमम॓ग, मगरे॒सा
पकड़: ऩिरे॒गमम॓ग, धम॓मग
रागांग: उत्तरांग
जाति: SHADAV-SHADAV
समय: Night का T桩牤 प्रहर
राग छायानट का परिचय
राग छायानट का परिचय
वादी: प
संवादी: रे
थाट: KALYAN
आरोह: सारेगमपनिधसां
अवरोह: सांनिधपम॓पधपमगरेसा
पकड़: प़प़रेसा, सारे, रेग, गम, मप, नि॒धपरे
रागांग: पूर्वांग
जाति: SAMPURN-SAMPURN
समय: Night का F楲獴 प्रहर
राग भैरव का परिचय
वादी: ध़॒
संवादी: सा
थाट: BHAIRAV
आरोह: सारे॒गमपध॒निसां
अवरोह: सांनिध॒पमगरे॒सा
पकड़: रे॒रे॒गमनिध॒पमरे॒सा
रागांग: उत्तरांग
जाति: SAMPURN-SAMPURN
समय: दिन का प्रथम प्रहर
राग बसन्त का परिचय
राग बसन्त का परिचय
वादी: सां
संवादी: प
थाट: PURVI
आरोह: सागम॓ध॒रें॒सां
अवरोह: रें॒निध॒प, म॓ग, म॓गरे॒सा
पकड़: म॓ध॒सां, म॓ध॒रें॒सां
रागांग: उत्तरांग
जाति: SHADAV-SAMPURN
समय: रात्रि का तृतीय प्रहर
Friday, March 27, 2020
राग
राग
योऽयं ध्वनिविशेषस्तु स्वरवर्णविभूषित:।
रंजको जनचित्तानां स राग: कथ्यते बुधै:।।
अर्थात् स्वरों की रचना जिसमें स्वर और वर्ण के युक्त होने के कारण मनुष्य के तित्त की रंजन या उसमें आनन्द विकसित हो, उसे राग कहते हैं।
वक्र-स्वर
वक्र-स्वर
आरोह अथवा अवरोह करने के समय जब किसी स्वर तक जाकर पुनः लौटकर उसके पीछे के स्वर पर आते हैं और फिर उसको छोड़कर आगे बढ़ते हैं तब जिस स्वर से लौटते हैं, उसी स्वर को वक्र स्वर कहते हैं।
जैसे : सा रे ग रे म
यहाँ गांधार वक्र हैं।
आरोह अथवा अवरोह करने के समय जब किसी स्वर तक जाकर पुनः लौटकर उसके पीछे के स्वर पर आते हैं और फिर उसको छोड़कर आगे बढ़ते हैं तब जिस स्वर से लौटते हैं, उसी स्वर को वक्र स्वर कहते हैं।
जैसे : सा रे ग रे म
यहाँ गांधार वक्र हैं।
पकड़-स्वर
पकड़-स्वर
ऐसे स्वर-समुदाय जिससे किसी राग को पहचाना जाता है, उसे पकड़ कहते हैं, जैसे : "ग रे नि रे सा" कहने से यमन राग का बोध होता है।
ऐसे स्वर-समुदाय जिससे किसी राग को पहचाना जाता है, उसे पकड़ कहते हैं, जैसे : "ग रे नि रे सा" कहने से यमन राग का बोध होता है।
तान
तान
गाने या बजाने में जो सरगम नियमित रूप से ताल में गाये-बजाये जाते हैं, उन्हीं तानों और सरगमों को सितार पर दिरदादिर दारा आदि बोल के सहारे बजाने से तोड़े बनते हैं। तान दो तरह के होते हैं- शुद्ध तान और कूट तान।
येन विस्तार्यते रागः स तानः कथ्यते बुधैः ।
शुद्धकूटविभेदेन द्विविधास्ते समीरिताः ।।
गाने या बजाने में जो सरगम नियमित रूप से ताल में गाये-बजाये जाते हैं, उन्हीं तानों और सरगमों को सितार पर दिरदादिर दारा आदि बोल के सहारे बजाने से तोड़े बनते हैं। तान दो तरह के होते हैं- शुद्ध तान और कूट तान।
झाला
झाला
सितार में चिकारी के तार पर कनिष्टिका या तर्जनी "रा रा" बजने को झाला कहते हैं। इसके कुछ अलग बोल हैं। यह ठीक भ्रमर के गुंजन के सामान मीठा और अच्छा मालूम होता है और नृत्य का आनंद मिलता है।
सितार में चिकारी के तार पर कनिष्टिका या तर्जनी "रा रा" बजने को झाला कहते हैं। इसके कुछ अलग बोल हैं। यह ठीक भ्रमर के गुंजन के सामान मीठा और अच्छा मालूम होता है और नृत्य का आनंद मिलता है।
गत
गत
बोलो की बंदिश जो स्वर और ताल में बंधी हो, उसे गत कहते हैं। इन बोलों के कुछ भी मायने नहीं होते परन्तु हस्त चालन द्वारा निर्देशित स्वर और ताल के मिश्रण को सुनने में आनंद आता है।
सितार पर स्वरों के सहारे और ताल में बंधी हुई दा दिर दा रा, दिरदादिरदारा आदि बोलों की बंदिश जो राग और ताल पर बंधी होती है, उसे गत कहते हैं।
बोलो की बंदिश जो स्वर और ताल में बंधी हो, उसे गत कहते हैं। इन बोलों के कुछ भी मायने नहीं होते परन्तु हस्त चालन द्वारा निर्देशित स्वर और ताल के मिश्रण को सुनने में आनंद आता है।
सितार पर स्वरों के सहारे और ताल में बंधी हुई दा दिर दा रा, दिरदादिरदारा आदि बोलों की बंदिश जो राग और ताल पर बंधी होती है, उसे गत कहते हैं।
Thursday, February 27, 2020
राग बिहाग एवं राग खमाज में तुलना
राग बिहाग एवं राग खमाज
समानता :
- दोनों रागों में ग वादी और नी सम्वादी माना गया है।
- दोनों राग रात्रि के प्रथम प्रहार में गाये जाते हैं।
- दोनों के अवरोह में सभी शुद्ध स्वर लगते हैं।
- दोनों का अवरोह सम्पूर्ण है।
विभिन्नता :
| राग बिहाग | राग खमाज |
|---|---|
| यह बिलावल थाट का राग है। | यह राग खमाज थाट का राग है। |
| यह आश्रय राग नहीं है। | यह राग खमाज थाट का आश्रय राग है। |
| यह औडव-सम्पूर्ण जाति का राग है। | यह राग षाडव - सम्पूर्ण जाति का राग है। |
| बिहाग में तीव्र मध्यम का प्रयोग बहुत अधिक होने लगा है जबकि यह विवादी स्वर है। | इस राग में ख्याल और ध्रुपद गाते समय किसी विवादी स्वर का प्रयोग नहीं होता है। |
| इस राग में ठुमरी नहीं गाये जाते हैं। | इस राग में ठुमरी गायी जाती है। |
जाति किसे कहते हैं? जातियां कितने प्रकार की हैं, समझाइये।
जाति - इससे राग में प्रयोग किये जानेवाले स्वरों की संख्या का ज्ञान होता है। किसी भी राग में कम से कम ५ और अधिक से अधिक ७ स्वर प्रयोग किये जाते हैं। स्वरों की संख्या की दृस्टि से मुख्य तीन प्रकार के राग हो सकते हैं:
- ५ स्वर वाले राग - ऐसे रागों की जाति को औडव कहा जाता है।
- ६ स्वर वाले राग - ऐसे रागों की जाति को षाडव कहा जाता है।
- ७ स्वर वाले राग - ऐसे रागों की जाति को सम्पूर्ण कहा जाता है।
राग में आरोह एवं अवरोह दोनों आवश्यक होते हैं। कुछ रागों में यह देखा जाता है की आरोह एवं अवरोह में लगने वाले स्वरों की संख्या सामान नहीं होती। जैसे - राग खमाज के आरोह में ६ और अवरोह में ७ स्वर प्रयोग किये जाते हैं। इस तरह अन्य राग भी हैं, जिनमे यदि आरोह में ५ स्वर प्रयोग किये जाते हैं तो अवरोह में ६ अथवा ७ स्वर प्रयोग किये जाते हैं।
इस प्रकार रागों की तीन जातियों को मिलकर ३x ३=९ जातियां होती हैं, जिनके नाम इस प्रकार हैं:
- औडव - औडव : आरोह एवं अवरोह दोनों में ५-५ स्वर।
- औडव - षाडव : आरोह में ५ एवं अवरोह में ६ स्वर।
- औडव - सम्पूर्ण : आरोह में ५ एवं अवरोह में ७ स्वर।
- षाडव - षाडव : आरोह एवं अवरोह दोनों में ६-६ स्वर।
- षाडव - औडव : आरोह में ६ एवं अवरोह में ५ स्वर।
- षाडव - सम्पूर्ण : आरोह में ६ एवं अवरोह में ७ स्वर।
- सम्पूर्ण - सम्पूर्ण : आरोह एवं अवरोह दोनों में ७-७ स्वर।
- सम्पूर्ण - षाडव : आरोह में ७ एवं अवरोह में ६ स्वर।
- सम्पूर्ण - औडव : आरोह में ७ एवं अवरोह में ५ स्वर।
राग किसे कहते हैं? राग के नियम अथवा लक्षण बताइये।
राग - स्वरों की वह सुन्दर रचना जो कानों को अच्छी लगे उसे राग कहते हैं. आजकल राग गायन हीं प्रचार में है. संगीत रत्नाकर में राग की परिभाषा इस प्रकार दी गयी है
'स्वर और वर्ण से विभूषित ध्वनि जो मनुष्य के मन का रंजन करे, राग कहलाता है'
राग में निम्न बातों का होना आवश्यक है:
- राग के नियम - प्रत्येक राग में रञ्जकता अर्थात मधुरता आवश्यक है, अर्थात कानों को अच्छा लगना आवश्यक है।
- राग में कम से कम ५ और अधिक से अधिक ७ स्वर होने चाहिए।
- प्रत्येक राग किसी न किसी थाट से उत्पन्न माना गया है।
- किसी भी राग में षडज अर्थात सा कभी-भी वर्जित नहीं होता, क्यूंकि यह सप्तक का आधार स्वर होता है।
- प्रत्येक राग में म और प में से कम से कम एक स्वर अवश्य होना चाहिए। दोनों स्वर एक साथ वर्जित नहीं हो सकते। यदि पंचम के साथ शुद्ध म भी वर्जित हो तो तीव्र-म अवश्य रहना चाहिए।
- प्रत्येक राग में आरोह अवरोह, वादी-सम्वादी, पकड़, समय आदि होना चाहिए।
- किसी भी राग में एक स्वर का दोनों रूप अर्थात शुद्ध-कोमल एक साथ नहीं प्रयोग होना चाहिए।
Sunday, February 16, 2020
Saturday, January 25, 2020
राग खमाज का परिचय
राग खमाज का परिचय
आरोह - सा ग म प नी सा
अवरोह - सां नी ध प म ग सा
पकड़ -
वादी - ग
संवादी - नी
जाति -षाडव-सम्पूर्ण
थाट - खमाज
गाने-बजाने का समय - रात्रि का दूसरा प्रहर
अवरोह - सां नी ध प म ग सा
पकड़ -
वादी - ग
संवादी - नी
जाति -षाडव-सम्पूर्ण
थाट - खमाज
गाने-बजाने का समय - रात्रि का दूसरा प्रहर
राग आसावरी का परिचय
वादी: ध॒
संवादी: ग॒
थाट: ASAWARI
आरोह: सारेमपध॒सां
अवरोह: सांनि॒ध॒पमग॒रेसा
पकड़: रेमपनि॒ध॒प
रागांग: उत्तरांग
जाति: AUDAV-SAMPURN
समय: दिन का प्रथम प्रहर
राग भूपाली का परिचय
राग भूपाली का परिचय
वादी: ग
संवादी: ध
थाट: KALYAN
आरोह: सारेगपधसां
अवरोह: सांधपगरेसा
पकड़: गरेसाध़सारेगपगधपगरेगप़ध़सारेग
रागांग: पूर्वांग
जाति: AUDAV-AUDAV
समय: रात्रि का प्रथम प्रहर
- हम तुमसे न कुछ कह पाये - जिद्दी
- ज्योति कलश छलके - भाभी की चुड़ियाँ
- कांची रे कांची रे - हरे रामा हरे कृष्णा
- पंछी बनूं उड़ती फिरूं - चोरी चोरी
- पंख होती तो उड़ आती रे - सेहरा
राग बिलावल का परिचय
वादी: ध
संवादी: ग
थाट: BILAWAL
आरोह: सारेगमपधनिसां
अवरोह: सांनिधपमगरेसा
पकड़: गरे गपधनिसां
रागांग: उत्तरांग
जाति: SAMPURN-SAMPURN
समय: दिन का प्रथम प्रहर
विशेष: आरोह में म का कम उपयोग होता है।
- कैसे
राग काफी का परिचय
राग काफी का परिचय
वादी: प
संवादी: सा
थाट: KAFI
आरोह: सारेग॒मपधनि॒सां
अवरोह: सांनि॒धपमग॒रेसा
पकड़: नि॒पग॒रे
रागांग: पूर्वांग
जाति: SAMPURN-SAMPURN
गाने-बजाने का समय - मध्य रात्री
- कैसे कहूं मन की बात - धूल का फूल
- तुम्हारा प्यार चाहिये मुझे जीने के लिये - मनोकामना
Friday, January 24, 2020
राग अहीर भैरव का परिचय
वादी: म
संवादी: सा
थाट: BHAIRAV
आरोह: सारे॒गमपधनि॒सां
अवरोह: सांनि॒धपमगमरे॒सा
पकड़: गमधधप, मगरे॒साऩि॒सा
रागांग: पूर्वांग
जाति: SAMPURN-SAMPURN
समय: दिन का प्रथम प्रहर
- अलबेला सजन आयो रे - हम दिल दे चुके सनम
- पूछो न कैसे मैंने रैन बिताई - मेरी सूरत तेरी आँखें
- सोलह बरस की बाली उमर को - एक दूजे के लिये
Thursday, January 16, 2020
पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर
घराना - ग्वालियर घराना
जन्म -०८ अगस्त १८७२
मृत्यु - २१ अगस्त १९३१
रचनाएँ -
संगीत बाल प्रकाश,
बीस भागों में राग प्रवेश,
संगीत शिक्षा,
महिला संगीत आदि।
ग्वालियर घराने के प्रसिद्ध संगीतज्ञ स्व० पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर का जन्म सन ०८ अगस्त १८७२, श्रवण पूर्णिमा को कुरुंदवाड़ रियासत के बेलगाँव नामक स्थान में हुआ. उनके पिता का नाम दिगंबर गोपाल और माता का नाम गंगा देवी था. पिता एक अच्छे कीर्तनकार थे. उनहोंने पंडित जी को एक अच्छे विद्यालय में भेजना प्रारम्भ किया दुर्भाग्यवश दीपावली के दिन आतिशबाजी से आँखें ख़राब हो गयीं. जिसके कारण उन्हें अध्ययन बंद करना पड़ा. आँख के बिना कोई उचित व्यवसाय न मिलने के कारण उनके पिता ने उनको संगीत सीखाना शुरू किया। उन्हें मिरज के पंडित बाल-कृष्ण बुआ इचलकरञ्जिकार के पास संगीत-शिक्षा ग्रहण करने के लिए भेज दिया। वहां मिरज रियासत के तत्कालीन महाराजा ने उन्हें राजाश्रय दिया और प्रत्येक प्रकार की व्यवस्था करा दी।
एक दुखद घटना: एक बार मिरज में एक सार्वजानिक सभा आयोजित हुई और रियासत के प्रतिष्ठित व्यक्तियों को निमंत्रित किया गया। पंडित विष्णु दिगंबर जी को राजाश्रय प्राप्त होने के कारन आमंत्रित तो किया गया, किन्तु उनके गुरु जी को नहीं बुलाया गया. इसे देखकर पंडित जी बड़े आश्चर्य में पड़े और इसका कारण जानना चाहा. पूछने पर उन्हें आश्चर्यजनक उत्तर उत्तर मिला कि वे तो गवैये हैं. उन्हें क्या आमंत्रित किया किया जाये. अपने पूज्य गुरु और गवैयों के बारे में कहे गए वाक्य उनके हृदय घर कर गए. पंडित जी ने उसी क्षण निर्णय लिया की वे संगीतज्ञों की दयनीय दशा सुधारने एवं संगीत के प्रचार एवं प्रसार करने के प्रयास में शेष जीवन समर्पित कर देंगे.
१८९६ में राजाश्रय के सभी सुखों को छोड़कर संगीत को उच्च स्थान दिलाने के लिए पंडित जी देश भ्रमण पर निकल पड़े। सतारा में उनका भव्य स्वागत हुआ और उनका गायन कार्यक्रम बहुत अच्छा रहा। जिससे वहां के लोगों में संगीत और संगीतज्ञों के प्रति श्रद्धा बढ़ी। इसके बाद उनहोंने भारत के अनेक स्थानों का भ्रमण किया और हर जगह संगीत से श्रोताओं को मुग्ध कर दिया। उनहोंने ग्वालियर, दिल्ली, बड़ौदा, भरतपुर, वाराणसी, आगरा, अलाहाबाद, जयपुर, लाहौर आदि स्थानों पर संगीत छवि को सुधारने हेतु उल्लेखनीय कार्य किया।
संगीत का प्रचार और प्रसार करने के लिए पंडित जी ने यह अनुभव किया की सर्वप्रथम प्रचलित गीतों से श्रृंगार रस के भद्दे शब्दों को निकाल कर भक्ति रस के सुन्दर शब्दों को रखा गया। दूसरे, संगीत के विद्यालय स्थापित किये, जहाँ बालक और बालिकाओं को संगीत शिक्षण की समुचित व्यवस्था की गयी. उनहोंने बहुत से गीत के शब्दों में परिवर्तन किये और ५ मई सन १९०१ को लाहौर में प्रथम संगीत विद्यालय - गांधर्व महाविद्यालय की स्थापना की। संस्था को भली-भांति चलने के लिए उन्हें कभी-कभी आर्थिक संकट का सामना पड़ा।
जो कुछ भी वो धन प्राप्त करते, वे इस कार्य में लगा देते। जब कोई विद्यार्थी नहीं आता था, तो वे स्वयं हीं तानपुरा निकलकर अभ्यास करते। कुछ दिनों के बाद विद्यार्थियों की संख्या में बढ़ोत्तरी होने लगी। वे विद्यालय के कार्यों में इतने मशगूल रहते थे कि जब उन्हीं अपने पिता की मृत्यु का समाचार मिला, तब भी वे घर नहीं जा सके।
सन १९०८ में पंडित जी ने बम्बई में गन्धर्व महाविद्यालय की एक शाखा खोली। वहां उन्हें लाहौर की तुलना में ज्यादा सफलता मिली। विद्यार्थयों की संख्या भी काफी बढ़ी। लगभग १५ वर्षों तक विद्यालय का कार्य सुचारु रूप से चलता रहा, किन्तु निजी भवन हेतु विद्यालय को काफी कर्ज लेना पड़ा। काफी समय तक कर्ज चुकाया नहीं जा सका। जिसके कारण भवन कर्ज में चला गया और विद्यालय बंद हो गया। तब पंडित जी का ध्यान राम-नाम में राम गया, वे गेरुआ वस्त्र धारण करने लगे और 'रघुपति राघव राजा राम। ... ' का सहारा ले लिए। हर समय इसी में मस्त रहने लगे। कालांतर में नासिक जाकर वहां 'रामनाम आश्रम' की स्थापना की।
वैदिक काल में प्रचलित आश्रम प्रणाली के आधार पर पलुस्कर जी १०० शिष्यों को शिक्षा दी। उनके अधिकांश शिष्य उनके साथ रहते, उनके खाने-पिने, रहने तथा शिक्षा का प्रबंध वे निःशुल्क करते। उनके शिष्यों में स्व० वि० ए० कशालकर, स्व० पंडित ओमकार नाथ ठाकुर आदि के नाम उल्लेखनीय हैं।
संगीत को लिपि बद्ध करने के लिए कोई लिपि प्रचलित नहीं थी, अतः उनहोंने एक स्वरलिपि पद्धति की रचना की, जो विष्णु दिगंबर स्वरलिपि पद्धति के नाम से प्रसिद्ध है। उनहोंने लगभग ५० पुस्तके लिखी जिनमे संगीत बाल प्रकाश, बीस भागों में राग प्रवेश, संगीत शिक्षा, महिला संगीत आदि। जनता में शीघ्र संगीत प्रचार करने के लिए कुछ समय तक 'संगीतामृत प्रवाह' नमक मासिक पत्रिका का प्रकाशन भी किया। सन १९३० में वे लकवाग्रस्त हो गए, किन्तु क्षमतानुसार संगीत की सेवा करते रहे।
अंत में २१ अगस्त १९३१ को उनहोंने प्राण त्याग दिए. उनके १२ पुत्रों में ११ पुत्रों का मृत्यु बाल्यावस्था में हिन् हो गई. केवल एक पुत्र दत्तात्रय विष्णु पलुस्कर अपने जीवन के ३५ वर्षों तक संगीत की सेवा कर सके, क्योंकि उनका भी काम हीं उम्र में सन १९५५ की विजयादशमी को देहांत हो गया।
Sunday, January 12, 2020
श्री विष्णु नारायण भातखण्डे-जीवनी
जन्म: १० अगस्त १८६०
मृत्यु: १९ सितम्बर १९३६
रचनाएँ:
- हिंदुस्तानी संगीत पद्धति (क्रमिक पुस्तक मलिका ६ भागों में),
- भातखण्डे संगीत शास्त्र ४ भागों में,
- अभिनव राग मञ्जरी,
- लक्ष्य संगीत,
- स्वरमालिका आदि.
श्री विष्णु नारायण भातखण्डे जी का जन्म १० अगस्त १८६० को बम्बई के बालकेश्वर नामक स्थान में कृष्ण जन्माष्टमी के दिन हुआ था. उनके पिता को संगीत से विशेष प्रेम था. उन्हें अपने पिता से संगीत सिखने की प्रेरणा मिली. अतः वे विद्यालयी शिक्षा के साथ-साथ संगीत शिक्षा के प्रति जागरूक रहे. उन्होंने सेंटर, गायन और बांसुरी की भी शिक्षा प्राप्त की और तीनों पर अच्छा अभ्यास किया. सेठ बल्लव दस से सितार और गुरु राव जी बुआ वेलबाथ कर, जयपुर के मुहम्मद अली खान, ग्वालियर के पंडित एकनाथ, रामपुर के कल्बे अली खान आदि गुरुजनों से गायन सीखा. सन १८८३ में स्नातक एवं १८९० में एल एल बी की परीक्षाएं उत्तीर्ण की. कुछ समय तक इन्होने वकालत भी की, किन्तु संगीत प्रेमी मन वकालत में अधिक दिनों तक रम न सका.
वकालत छोड़कर वे संगीत सेवा में लग गए. शास्त्रीय संगीत की ओर संगीतज्ञों का ध्यान आकर्षित करने का श्रेय पंडित जी को है. उनके समय के संगीतज्ञ संगीत शास्त्र पर बिलकुल ध्यान नहीं देते थे, अतः उनके गायन-वादन में अनेक विषमताएं मिलती थी. अतः उनहोंने विभिन्न भागों का भ्रमण किया और संगीत के प्राचीन ग्रंथों की खोज की. यात्रा में जहाँ भी उन्हें संगीत का विद्वान मिलते, वे उन सबसे सहर्ष मिलते. उनसे धन देकर या शिष्य बनकर, अथवा सेवा कर ज्ञान प्राप्त किया. इस कार्य में उन्हें कई बार दिक्क्तें भी उठानी पड़ी. विभिन्न रागों के बहुत से गीत एकत्रित किये और उनकी स्वरलिपि भातखण्डे क्रमिक पुस्तक ६ भागों में संगृहीत कर संगीत-प्रेमियों के लिए अथाह भंडार बना दिया. उस समय किसी व्यक्ति को केवल एक गीत सिखने के लिए वर्षों तक सेवा करनी पड़ती थी. ऐसे वक्त में पुस्तकों की श्रृंखला का उपलब्ध हो जाना विद्यार्थियों की लिए लाभप्रद सिद्ध हुआ.
किर्यात्मक संगीत को लिपिबद्ध करने भातखण्डे जी ने एक सरल और नयी स्वरलिपि पद्धति की पद्धति के नाम से प्रसिद्ध है. उत्तरी हिंदुस्तान में इस पद्धति का प्रचलित है. यह पद्धति अन्य की तुलना में सरल और सुबोध हैं.
इसके अतिरिक्त राग वर्गीकरण का एक नविन प्रकार - थाट राग वर्गीकरण को प्रचारित करने का श्रेय भी इन्हीं को जाता हैं. उन्होंने वैज्ञानिक ढंग से समस्त रागों को १० थाटों में विभाजित किया. उनके समय में राग-रागिनी पद्धति प्रचलित थी. उन्होंने उसकी कमियों को समझते हुए थाट का प्रचार किया तथा काफी के स्थान पर बिलावल को शुद्ध थाट माना.
जिस समय भारत में रेडियो का प्रचार नहीं था उस समय भातखण्डे जी ने संगीत के प्रचार हेतु संगीत-सम्मलेन की कल्पना की और सं १९१६ में बड़ौदा नरेश की सहायता से प्रथम संगीत सम्मलेन सफलता पूर्वक आयोजित किया. उस समय में अखिल भारतीय संगीत अकादमी स्थापित करने का प्रस्ताव सर्व सम्मति से पास हुआ. शीघ्र हिन् उसकी स्थापना हुई, किन्तु अधिक समय तक कार्य न कर सकी. सन १९२५ तक उन्होंने पांच बृहद संगीत सम्मलेन आयोजित किये. उनके प्रयत्नों से कई संगीत-विद्यालयों की स्थापना हुई. उनमे से मुख्या हैं - मैरिस म्यूजिक कॉलेज (भातखण्डे संगीत विद्यापीठ) लखनऊ, माधव संगीत विद्यालय ग्वालियर तथा म्यूजिक कॉलेज बड़ौदा.
उनकी प्रमुख रचनाओं हैं- हिंदुस्तानी संगीत पद्धति (क्रमिक पुस्तक मलिका ६ भागों में), भातखण्डे संगीत शास्त्र ४ भागों में, अभिनव राग मञ्जरी, लक्ष्य संगीत, स्वरमालिका आदि.
इस प्रकार भातखण्डे जी जीवन भर संगीत की सेवा करते रहे और अंत में १९ सितम्बर १९३६ को उनका स्वर्गवास हो गया.
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Saturday, December 28, 2019
तानसेन - जीवनी
तानसेन का असली नाम तन्ना मिश्र था और पिता का नाम मकरंद पांडे। कुछ लोग पांडे जी को मिश्र भी कहते थे। तानसेन की जन्मतिथि के विषय में अनेक मत हैं। अधिकांश विद्वानों के मतानुसार उनका जन्म 1532 ईसवी में ग्वालियर से 7 मील दूर बेहट ग्राम में हुआ था। उनके जन्म के विषय में यह किवदंती है कि बहुत दिनों तक मकरन्द पांडे संतानहीन थे। अतः वे बहुत चिंतित रहा करते थे। मोहम्मद गौस नामक फकीर के आशीर्वाद से पुत्र उत्पन्न हुआ जिसका नाम तन्ना रखा गया। अपने पिता के एकमात्र संतान होने के कारण उनका पालन पोषण बड़े लाड़ प्यार में हुआ। फलस्वरूप अपनी बाल्यावस्था में वे बड़े नटखट और उद्दंड रहे। प्रारंभ से ही तन्ना में दूसरों की नकल करने की बड़ी क्षमता थी। बालक तन्ना पशु पक्षियों तथा जानवरों की विभिन्न बोलियों की सच्ची नकल करता था और नटखट प्रकृति का होने के कारण हिंसक पशुओं की बोली से लोगों को डराया करता था। इसी बीच स्वामी हरिदास से उनकी भेंट हो गई।
मिलने की भी एक मनोरंजक कथा है। एक बार स्वामी जी अपनी मंडली के साथ पास के जंगल से गुजर रहे थे। नटखट तन्ना ने एक पेड़ की आड़ लेकर शेर की आवाज निकालकर सबको डरा दिया। स्वामी हरिदास उनकी इस प्रतीभा से अत्यधिक प्रभावित हुए और उनके पिता से तानसेन को संगीत सिखाने के लिए मना लिया और अपने साथ तानसेन को वृंदावन ले गए।
इस प्रकार तानसेन स्वामी हरिदास के साथ रहने लगे और 10 वर्ष तक शिक्षा प्राप्त करते रहें अपने पिता की अस्वस्थता सुनकर तानसेन अपनी मातृभूमि ग्वालियर चले गये। कुछ दिनों के बाद उनके पिता ने तानसेन को बुलाकर कहा कि तुम्हारा जन्म मुहम्मद गौस के आशीर्वाद स्वरुप हुआ है। अत: उनकी आज्ञा की अवहेलना कभी न करना। तब स्वामी हरिदास से आज्ञा लेकर तानसेन मुहम्मद गौस के पास रहने लगे। वहां कभी-कभी ग्वालियर की रानी मृगनयनी का गाना सुनने के लिए जाया करते थे। वहां उसकी दासी हुसैनी की सुन्दरता और संगीत ने तानसेन को अपनी ओर आकर्षित किया। तानसेन के चार पुत्र हुए, सूरत सेन, शरतसेन, तरंगसेन, बिलास खां और सरस्वती नाम की एक पुत्री।
जब तानसेन एक अच्छे गायक हो गए तो रीवानरेश रामचंद्र ने उन्हें राज्य गायक बना लिया। महाराज रामचंद्र और अकबर में घनिष्ट मित्रता थी। महाराज रामचंद्र ने अकबर को प्रशन्न करने के लिए गायक तानसेन को उन्हें उपहार स्वरूप भेंट कर दिया। अकबर स्वयं भी संगीत का प्रेमी था। वह उन्हें पाकर अत्यधिक प्रसन्न हुआ और अपने नवरत्नों में उन्हें शामिल कर लिया। धीरे-धीरे अकबर तानसेन को बहुत मानने लगा फलस्वरूप दरबार के अन्य गायक उनसे जलने लगे। उन लोगों ने तानसेन को खत्म करने के लिये एक युक्ति निकाली। सभी गायकों ने अकबर बादशाह से प्रार्थना किया कि तानसेन से दीपक राग सुना जाए और यह देखा जाए कि दीपक राग में कितना प्रभाव है। तानसेन के अतिरिक्त को दूसरा गायक इसे गा नहीं सकेगा यह बात बादशाह के दिमाग में जम गई। उसने तानसेन को दीपक राग गाने को बाध्य किया। तानसेन अकबर को बहुत समझाया कि दीपक राग के गाने का परिणाम बहुत बुरा होगा किंतु बादशाह के सामने उन्हों दीपक राग गाने के लिये बाध्य होना पड़ा। दीपक राग गीते हीं गर्मी बढ़ने लगी और चारों ओर से मानो अग्नि की लपटें निकलने लगी। श्रोतागण तो गर्मी के मारे भाग निकले किंतु तानसेन का शरीर प्रचंड गर्मी से जलने लगा। उसकी गर्मी केवल मेघ राग से समाप्त हो सकती थी। कहा जाता है कि तानसेन की पुत्री सरस्वती ने राग मेघ गाकर अपने पिता की जीवन रक्षा की। बादशाह को अपनी हठ पर बड़ा पश्चाताप हुआ।
बैजू बावरा तानसेन का समकालीन था। कहा जाता है कि एक बार दोनों गायकों में प्रतियोगिता हुई और तानसेन की हार हुई। इसके पूर्व तानसेन ने घोषणा करा दी थी कि उसके अतिरिक्त राज्य में कोई भी व्यक्ति गाना न गाये और जो गाएगा तानसेन के साथ उसकी प्रतियोगिता होगी। जो हारेगा उसे उसी समय मृत्यु दंड मिलेगा। कोई गायक उसे हरा नहीं सका। अंत में बैजू बावरा ने उसे परास्त किया। शर्त के अनुसार तानसेन को मृत्युदण्ड मिलना चाहिए था किंतु बैजू बावरा ने उसे क्षमा कर अपने विशाल ह्रदय का परिचय दिया।
तानसेन ने अनेक रागों की रचना की जैसे दरबारी कान्हड़ा, मियां की सारंग, मियां की तोड़ी, मियां मल्हार आदि। कहा जाता है कि तानसेन ने बाद में मुसलमान धर्म स्वीकार कर लिया। उसने ऐसा क्यों किया, इस विषय में विद्वानों के अनेक मत हैं। कुछ का कहना है कि गुरु की आज्ञा से वह मुसलमान हो गए और कुछ का कहना है कि अकबर की पुत्री से उसकी विवाह हुई थी इसलिए उसने मुसलमान धर्म स्वीकार कर लिया। कुछ विद्वानों का यह भी मत है कि तानसेन मुसलमान हुए ही नहीं। उसने फकीर गुलाम गौस की स्मृति में नवीन रागों के नाम के आगे मियां शब्द जोड़ दिया जैसे मियां मल्हार आदि सन 1585 ईसवी में दिल्ली में तानसेन की मृत्यु हुई और ग्वालियर में गुलाम गौस के कब्र के पास उनकी समाधि बनाई गई।
मिलने की भी एक मनोरंजक कथा है। एक बार स्वामी जी अपनी मंडली के साथ पास के जंगल से गुजर रहे थे। नटखट तन्ना ने एक पेड़ की आड़ लेकर शेर की आवाज निकालकर सबको डरा दिया। स्वामी हरिदास उनकी इस प्रतीभा से अत्यधिक प्रभावित हुए और उनके पिता से तानसेन को संगीत सिखाने के लिए मना लिया और अपने साथ तानसेन को वृंदावन ले गए।
इस प्रकार तानसेन स्वामी हरिदास के साथ रहने लगे और 10 वर्ष तक शिक्षा प्राप्त करते रहें अपने पिता की अस्वस्थता सुनकर तानसेन अपनी मातृभूमि ग्वालियर चले गये। कुछ दिनों के बाद उनके पिता ने तानसेन को बुलाकर कहा कि तुम्हारा जन्म मुहम्मद गौस के आशीर्वाद स्वरुप हुआ है। अत: उनकी आज्ञा की अवहेलना कभी न करना। तब स्वामी हरिदास से आज्ञा लेकर तानसेन मुहम्मद गौस के पास रहने लगे। वहां कभी-कभी ग्वालियर की रानी मृगनयनी का गाना सुनने के लिए जाया करते थे। वहां उसकी दासी हुसैनी की सुन्दरता और संगीत ने तानसेन को अपनी ओर आकर्षित किया। तानसेन के चार पुत्र हुए, सूरत सेन, शरतसेन, तरंगसेन, बिलास खां और सरस्वती नाम की एक पुत्री।
जब तानसेन एक अच्छे गायक हो गए तो रीवानरेश रामचंद्र ने उन्हें राज्य गायक बना लिया। महाराज रामचंद्र और अकबर में घनिष्ट मित्रता थी। महाराज रामचंद्र ने अकबर को प्रशन्न करने के लिए गायक तानसेन को उन्हें उपहार स्वरूप भेंट कर दिया। अकबर स्वयं भी संगीत का प्रेमी था। वह उन्हें पाकर अत्यधिक प्रसन्न हुआ और अपने नवरत्नों में उन्हें शामिल कर लिया। धीरे-धीरे अकबर तानसेन को बहुत मानने लगा फलस्वरूप दरबार के अन्य गायक उनसे जलने लगे। उन लोगों ने तानसेन को खत्म करने के लिये एक युक्ति निकाली। सभी गायकों ने अकबर बादशाह से प्रार्थना किया कि तानसेन से दीपक राग सुना जाए और यह देखा जाए कि दीपक राग में कितना प्रभाव है। तानसेन के अतिरिक्त को दूसरा गायक इसे गा नहीं सकेगा यह बात बादशाह के दिमाग में जम गई। उसने तानसेन को दीपक राग गाने को बाध्य किया। तानसेन अकबर को बहुत समझाया कि दीपक राग के गाने का परिणाम बहुत बुरा होगा किंतु बादशाह के सामने उन्हों दीपक राग गाने के लिये बाध्य होना पड़ा। दीपक राग गीते हीं गर्मी बढ़ने लगी और चारों ओर से मानो अग्नि की लपटें निकलने लगी। श्रोतागण तो गर्मी के मारे भाग निकले किंतु तानसेन का शरीर प्रचंड गर्मी से जलने लगा। उसकी गर्मी केवल मेघ राग से समाप्त हो सकती थी। कहा जाता है कि तानसेन की पुत्री सरस्वती ने राग मेघ गाकर अपने पिता की जीवन रक्षा की। बादशाह को अपनी हठ पर बड़ा पश्चाताप हुआ।
बैजू बावरा तानसेन का समकालीन था। कहा जाता है कि एक बार दोनों गायकों में प्रतियोगिता हुई और तानसेन की हार हुई। इसके पूर्व तानसेन ने घोषणा करा दी थी कि उसके अतिरिक्त राज्य में कोई भी व्यक्ति गाना न गाये और जो गाएगा तानसेन के साथ उसकी प्रतियोगिता होगी। जो हारेगा उसे उसी समय मृत्यु दंड मिलेगा। कोई गायक उसे हरा नहीं सका। अंत में बैजू बावरा ने उसे परास्त किया। शर्त के अनुसार तानसेन को मृत्युदण्ड मिलना चाहिए था किंतु बैजू बावरा ने उसे क्षमा कर अपने विशाल ह्रदय का परिचय दिया।
तानसेन ने अनेक रागों की रचना की जैसे दरबारी कान्हड़ा, मियां की सारंग, मियां की तोड़ी, मियां मल्हार आदि। कहा जाता है कि तानसेन ने बाद में मुसलमान धर्म स्वीकार कर लिया। उसने ऐसा क्यों किया, इस विषय में विद्वानों के अनेक मत हैं। कुछ का कहना है कि गुरु की आज्ञा से वह मुसलमान हो गए और कुछ का कहना है कि अकबर की पुत्री से उसकी विवाह हुई थी इसलिए उसने मुसलमान धर्म स्वीकार कर लिया। कुछ विद्वानों का यह भी मत है कि तानसेन मुसलमान हुए ही नहीं। उसने फकीर गुलाम गौस की स्मृति में नवीन रागों के नाम के आगे मियां शब्द जोड़ दिया जैसे मियां मल्हार आदि सन 1585 ईसवी में दिल्ली में तानसेन की मृत्यु हुई और ग्वालियर में गुलाम गौस के कब्र के पास उनकी समाधि बनाई गई।
Tuesday, March 19, 2019
Friday, February 22, 2019
Mera jeevan tere hawale : Mr. Ashok Kumar
Bhajan - Mera jeevan tere hawale by Mr. Ashok Kumar, PGT (Music), M. N. D. +2 High School Raipur Ujiarpur, Samastipur.
Tere naam Ka deewana : Mr. Ashok Kumar
Gajal - Tere naam Ka deewana by Mr. Ashok Kumar, PGT (Music), M. N. D. +2 High School Raipur Ujiarpur, Samastipur.
Thursday, February 14, 2019
कण : परिभाषा
किसी दूसरे को स्पर्श कर के जब कोई स्वर बजाया जाता है तब उस किये हुए स्वर को कण कहा जाता है। ये दो प्रकार के होते हैं:
१. निचे के स्वर से ऊपर के स्वर तक जाते हैं:
रे ग प
ग, म, सां
२. यह कण ऊपर के स्वर को लेकर नीचे के स्वर पर आने से होता है:
ग म नि
सा, ग, प
Monday, February 11, 2019
Sunday, February 10, 2019
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राग अल्हैया बिलावल का परिचय
थाट - बिलावल जाति - षाडव - सम्पूर्ण
वादी - धैवत संवादी - गंधार
वर्ज्य स्वर - आरोह में म
आरोह - सा, ग रे ग प, ध नि सां
सम्प्रकृति राग - बिलावल
विशेषताये
१. भोर आई गया अन्धियारा - बावर्ची
२. सारे के सारे ग म को लेकर गाते चले - परिचय
वादी - धैवत संवादी - गंधार
वर्ज्य स्वर - आरोह में म
विकृत स्वर - अवरोह में वक्र कोमल नि
आरोह - सा, ग रे ग प, ध नि सां
अवरोह - सां नि ध प, घ नि ध प, म ग म रे सा
पकड़ - ग प ध नि ध प, म ग म रे
समय - दिन का प्रथम प्रहर
पकड़ - ग प ध नि ध प, म ग म रे
समय - दिन का प्रथम प्रहर
सम्प्रकृति राग - बिलावल
विशेषताये
- यह बिलावल का एक प्रकार है
- आरोह-अवरोह दोनों में शुद्ध नि प्रयोग करते हैं.
- कोमल नि केवल अवरोह में इस प्रकार प्रयोग किया जाता है - सां नि ध प, ध नि ध प
- राग की चलन उत्तरांग में अधिक होती है.
- अवरोह में ग स्वर वक्र प्रयोग होता है, जैसे - म ग म रे
१. भोर आई गया अन्धियारा - बावर्ची
२. सारे के सारे ग म को लेकर गाते चले - परिचय
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