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Saturday, January 25, 2020

राग खमाज का परिचय

राग खमाज का परिचय
आरोह - सा ग म प नी सा
अवरोह - सां नी ध प म ग  सा
पकड़ - 
वादी - ग
संवादी - नी
जाति -षाडव-सम्पूर्ण
थाट - खमाज
गाने-बजाने का समय - रात्रि का दूसरा प्रहर

राग आसावरी का परिचय

वादी: ध॒
संवादी: ग॒
थाट: ASAWARI
आरोह: सारेमपध॒सां
अवरोह: सांनि॒ध॒पमग॒रेसा
पकड़: रेमपनि॒ध॒प
रागांग: उत्तरांग
जाति: AUDAV-SAMPURN
समय: दिन का प्रथम  प्रहर

राग भूपाली का परिचय

राग भूपाली का परिचय
वादी: 
संवादी: 
थाट: KALYAN
आरोह: सारेगपधसां
अवरोह: सांधपगरेसा
पकड़: गरेसाध़सारेगपगधपगरेगप़ध़सारेग
रागांग: पूर्वांग
जाति: AUDAV-AUDAV
समय: रात्रि  का प्रथम प्रहर


  1. हम तुमसे न कुछ कह पाये - जिद्दी
  2. ज्योति कलश छलके - भाभी की चुड़ियाँ
  3. कांची रे कांची रे - हरे रामा हरे कृष्णा
  4. पंछी बनूं उड़ती फिरूं - चोरी चोरी
  5. पंख होती तो उड़ आती रे - सेहरा

राग बिलावल का परिचय

वादी: 
संवादी: 
थाट: BILAWAL
आरोह: सारेगमपधनिसां
अवरोह: सांनिधपमगरेसा
पकड़: गरे गपधनिसां
रागांग: उत्तरांग
जाति: SAMPURN-SAMPURN
समय: दिन का प्रथम प्रहर
विशेष: आरोह में म का कम उपयोग होता है।


  1. कैसे 

राग काफी का परिचय

राग काफी का परिचय
वादी: 
संवादी: सा
थाट: KAFI
आरोह: सारेग॒मपधनि॒सां
अवरोह: सांनि॒धपमग॒रेसा
पकड़: नि॒पग॒रे
रागांग: पूर्वांग
जाति: SAMPURN-SAMPURN

गाने-बजाने का समय - मध्य रात्री


  1. कैसे कहूं मन की बात - धूल का फूल
  2. तुम्हारा प्यार चाहिये मुझे जीने के लिये - मनोकामना

Friday, January 24, 2020

राग अहीर भैरव का परिचय

वादी: 
संवादी: सा
थाट: BHAIRAV
आरोह: सारे॒गमपधनि॒सां
अवरोह: सांनि॒धपमगमरे॒सा
पकड़: गमधधप, मगरे॒साऩि॒सा
रागांग: पूर्वांग
जाति: SAMPURN-SAMPURN
समय: दिन का प्रथम प्रहर


  1. अलबेला सजन आयो रे - हम दिल दे चुके सनम
  2. पूछो न कैसे मैंने रैन बिताई - मेरी सूरत तेरी आँखें
  3. सोलह बरस की बाली उमर को - एक दूजे के लिये

Thursday, January 16, 2020

पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर


घराना - ग्वालियर घराना
जन्म -०८ अगस्त  १८७२
मृत्यु - २१ अगस्त १९३१
रचनाएँ -
              संगीत बाल प्रकाश,
              बीस भागों में राग प्रवेश,
              संगीत शिक्षा,
              महिला संगीत आदि।
 ग्वालियर घराने के प्रसिद्ध संगीतज्ञ स्व० पंडित विष्णु दिगंबर  पलुस्कर का जन्म सन ०८ अगस्त  १८७२, श्रवण पूर्णिमा को कुरुंदवाड़ रियासत के बेलगाँव नामक स्थान में हुआ. उनके पिता का नाम  दिगंबर गोपाल और माता का नाम गंगा देवी था. पिता एक अच्छे कीर्तनकार थे. उनहोंने पंडित जी को एक अच्छे विद्यालय में भेजना प्रारम्भ किया  दुर्भाग्यवश दीपावली के दिन आतिशबाजी से  आँखें ख़राब हो गयीं.  जिसके कारण उन्हें अध्ययन बंद करना पड़ा. आँख के बिना कोई उचित व्यवसाय न मिलने के कारण उनके पिता ने उनको संगीत  सीखाना शुरू किया। उन्हें मिरज के पंडित बाल-कृष्ण बुआ इचलकरञ्जिकार के पास संगीत-शिक्षा ग्रहण करने के  लिए भेज दिया। वहां मिरज रियासत के तत्कालीन महाराजा ने उन्हें राजाश्रय दिया और  प्रत्येक प्रकार की व्यवस्था करा दी।
 एक दुखद घटना: एक बार मिरज में एक सार्वजानिक सभा आयोजित हुई और रियासत के प्रतिष्ठित व्यक्तियों को निमंत्रित किया गया।  पंडित विष्णु दिगंबर जी को राजाश्रय प्राप्त होने के कारन आमंत्रित तो किया गया, किन्तु उनके गुरु जी को नहीं बुलाया गया. इसे देखकर पंडित जी बड़े आश्चर्य में पड़े और इसका कारण जानना चाहा. पूछने पर उन्हें आश्चर्यजनक उत्तर उत्तर मिला कि वे तो गवैये हैं. उन्हें क्या आमंत्रित किया किया जाये. अपने पूज्य गुरु और गवैयों के बारे में कहे गए वाक्य उनके हृदय  घर कर गए. पंडित जी ने उसी क्षण निर्णय लिया की वे संगीतज्ञों की दयनीय दशा सुधारने एवं संगीत के प्रचार एवं प्रसार करने के प्रयास में शेष जीवन समर्पित कर देंगे.

१८९६  में राजाश्रय के सभी सुखों को छोड़कर संगीत को उच्च स्थान दिलाने के लिए पंडित जी देश भ्रमण पर निकल पड़े।  सतारा में उनका भव्य स्वागत हुआ और उनका गायन कार्यक्रम बहुत अच्छा रहा।  जिससे वहां के लोगों में संगीत और संगीतज्ञों के प्रति श्रद्धा बढ़ी।  इसके बाद उनहोंने भारत के अनेक स्थानों का भ्रमण किया और हर जगह संगीत से श्रोताओं को मुग्ध कर दिया।  उनहोंने ग्वालियर, दिल्ली, बड़ौदा, भरतपुर, वाराणसी, आगरा, अलाहाबाद, जयपुर, लाहौर आदि स्थानों पर संगीत  छवि को सुधारने हेतु उल्लेखनीय कार्य किया।

संगीत का प्रचार और प्रसार करने के लिए पंडित जी ने यह अनुभव किया की सर्वप्रथम प्रचलित गीतों से श्रृंगार रस के भद्दे शब्दों को निकाल कर भक्ति रस  के सुन्दर शब्दों को रखा गया।  दूसरे, संगीत के  विद्यालय स्थापित किये, जहाँ बालक और बालिकाओं को संगीत शिक्षण की समुचित व्यवस्था की गयी. उनहोंने बहुत से गीत के शब्दों में परिवर्तन किये और ५ मई सन  १९०१ को लाहौर में प्रथम संगीत विद्यालय - गांधर्व  महाविद्यालय की स्थापना की। संस्था को भली-भांति चलने के लिए उन्हें कभी-कभी आर्थिक संकट का सामना  पड़ा।
जो कुछ भी वो धन प्राप्त करते, वे इस कार्य में लगा देते।  जब कोई विद्यार्थी नहीं आता था, तो वे स्वयं हीं  तानपुरा निकलकर अभ्यास करते।  कुछ दिनों के बाद विद्यार्थियों की संख्या में बढ़ोत्तरी होने लगी।  वे विद्यालय के कार्यों में इतने मशगूल रहते थे कि जब उन्हीं अपने पिता की मृत्यु का समाचार मिला, तब भी वे घर नहीं जा सके।

सन १९०८ में पंडित जी ने बम्बई में गन्धर्व महाविद्यालय की एक शाखा खोली।  वहां उन्हें लाहौर की तुलना में ज्यादा सफलता मिली।  विद्यार्थयों की संख्या भी काफी बढ़ी।  लगभग १५ वर्षों तक विद्यालय का कार्य सुचारु रूप से चलता रहा, किन्तु निजी भवन हेतु विद्यालय को काफी कर्ज लेना पड़ा।  काफी समय तक कर्ज चुकाया नहीं जा सका।  जिसके कारण भवन कर्ज में चला गया और विद्यालय बंद हो गया।  तब पंडित जी का ध्यान राम-नाम में राम गया, वे गेरुआ वस्त्र धारण करने लगे और 'रघुपति राघव राजा राम। ... ' का सहारा ले लिए।  हर समय इसी में मस्त रहने लगे।  कालांतर में नासिक जाकर वहां 'रामनाम आश्रम' की स्थापना की।

वैदिक काल में प्रचलित आश्रम प्रणाली के आधार पर पलुस्कर जी  १०० शिष्यों को शिक्षा दी।  उनके अधिकांश शिष्य  उनके साथ रहते, उनके खाने-पिने, रहने तथा शिक्षा का प्रबंध वे निःशुल्क करते।  उनके शिष्यों में स्व० वि० ए० कशालकर, स्व० पंडित ओमकार नाथ ठाकुर आदि के नाम उल्लेखनीय हैं।

संगीत को लिपि बद्ध  करने के लिए कोई लिपि प्रचलित नहीं थी, अतः उनहोंने एक स्वरलिपि पद्धति की रचना की, जो विष्णु दिगंबर स्वरलिपि पद्धति के नाम से प्रसिद्ध है।  उनहोंने लगभग ५० पुस्तके लिखी जिनमे संगीत बाल प्रकाश, बीस भागों में राग प्रवेश, संगीत शिक्षा, महिला संगीत आदि।  जनता में शीघ्र संगीत प्रचार करने के लिए कुछ समय तक 'संगीतामृत प्रवाह' नमक मासिक पत्रिका का प्रकाशन भी किया।  सन १९३० में वे लकवाग्रस्त हो गए, किन्तु क्षमतानुसार संगीत की सेवा करते रहे।

अंत में २१ अगस्त १९३१ को उनहोंने प्राण त्याग दिए. उनके १२ पुत्रों में ११ पुत्रों का मृत्यु बाल्यावस्था में हिन् हो गई. केवल एक पुत्र दत्तात्रय विष्णु पलुस्कर अपने जीवन के ३५ वर्षों  तक संगीत की सेवा कर सके, क्योंकि उनका भी काम हीं  उम्र में सन १९५५ की विजयादशमी को देहांत हो गया।



Sunday, January 12, 2020

श्री विष्णु नारायण भातखण्डे-जीवनी


जन्म: १० अगस्त १८६०
मृत्यु: १९ सितम्बर १९३६
रचनाएँ:

  • हिंदुस्तानी संगीत पद्धति (क्रमिक पुस्तक मलिका ६ भागों में), 
  • भातखण्डे संगीत शास्त्र ४ भागों में, 
  • अभिनव राग मञ्जरी, 
  • लक्ष्य संगीत, 
  • स्वरमालिका आदि.


श्री विष्णु नारायण भातखण्डे जी का जन्म १० अगस्त १८६० को बम्बई के बालकेश्वर नामक स्थान में कृष्ण जन्माष्टमी के दिन हुआ था. उनके पिता को संगीत से विशेष प्रेम था. उन्हें अपने पिता से संगीत सिखने की प्रेरणा मिली. अतः वे विद्यालयी शिक्षा के साथ-साथ संगीत शिक्षा के प्रति जागरूक रहे. उन्होंने सेंटर, गायन और बांसुरी की भी शिक्षा प्राप्त की और तीनों पर अच्छा अभ्यास किया. सेठ बल्लव दस से सितार और गुरु राव जी बुआ वेलबाथ कर, जयपुर के मुहम्मद अली खान, ग्वालियर के पंडित एकनाथ, रामपुर के कल्बे अली खान आदि गुरुजनों से गायन सीखा. सन १८८३ में स्नातक एवं १८९० में एल एल बी  की परीक्षाएं उत्तीर्ण की.  कुछ समय तक इन्होने वकालत भी की, किन्तु संगीत प्रेमी मन वकालत में अधिक दिनों तक रम न सका. 

वकालत छोड़कर वे संगीत सेवा में लग गए. शास्त्रीय संगीत की ओर संगीतज्ञों का ध्यान आकर्षित करने का श्रेय पंडित जी को है. उनके समय के संगीतज्ञ संगीत शास्त्र पर बिलकुल ध्यान नहीं देते थे, अतः उनके गायन-वादन में अनेक विषमताएं मिलती थी. अतः उनहोंने विभिन्न भागों का भ्रमण किया और संगीत के प्राचीन ग्रंथों की खोज की. यात्रा में जहाँ भी उन्हें संगीत का विद्वान मिलते, वे उन सबसे सहर्ष मिलते. उनसे धन देकर या शिष्य बनकर, अथवा सेवा कर ज्ञान प्राप्त किया. इस कार्य में उन्हें कई बार दिक्क्तें भी उठानी पड़ी. विभिन्न रागों के बहुत से गीत एकत्रित किये और उनकी स्वरलिपि भातखण्डे क्रमिक पुस्तक ६ भागों में संगृहीत कर संगीत-प्रेमियों के लिए अथाह भंडार बना दिया. उस समय किसी व्यक्ति को केवल एक गीत सिखने के लिए वर्षों तक  सेवा करनी पड़ती थी. ऐसे वक्त में पुस्तकों की श्रृंखला का उपलब्ध हो जाना विद्यार्थियों की लिए लाभप्रद सिद्ध हुआ. 

किर्यात्मक संगीत को लिपिबद्ध करने  भातखण्डे जी ने एक सरल और नयी स्वरलिपि पद्धति की    पद्धति के नाम से प्रसिद्ध है. उत्तरी हिंदुस्तान में इस पद्धति का प्रचलित है. यह पद्धति अन्य की तुलना में सरल और सुबोध हैं. 

इसके अतिरिक्त राग वर्गीकरण का एक नविन प्रकार - थाट राग वर्गीकरण को प्रचारित करने का श्रेय भी इन्हीं को जाता हैं.  उन्होंने वैज्ञानिक ढंग से समस्त रागों को १० थाटों में विभाजित किया. उनके समय में राग-रागिनी पद्धति प्रचलित थी. उन्होंने उसकी कमियों को समझते हुए थाट का प्रचार किया तथा काफी के स्थान पर बिलावल को शुद्ध थाट माना. 

जिस  समय भारत में रेडियो का प्रचार नहीं था उस समय भातखण्डे जी ने संगीत के प्रचार हेतु संगीत-सम्मलेन की कल्पना की और सं १९१६ में बड़ौदा नरेश की सहायता से प्रथम संगीत सम्मलेन सफलता पूर्वक आयोजित किया. उस समय में अखिल भारतीय संगीत अकादमी स्थापित करने का प्रस्ताव सर्व सम्मति से पास हुआ. शीघ्र हिन् उसकी स्थापना हुई, किन्तु अधिक समय तक कार्य न कर सकी. सन १९२५ तक उन्होंने पांच बृहद संगीत सम्मलेन आयोजित किये. उनके प्रयत्नों से कई संगीत-विद्यालयों की स्थापना हुई. उनमे से मुख्या हैं - मैरिस म्यूजिक कॉलेज (भातखण्डे संगीत विद्यापीठ) लखनऊ, माधव संगीत विद्यालय ग्वालियर तथा म्यूजिक कॉलेज बड़ौदा. 

उनकी प्रमुख रचनाओं हैं- हिंदुस्तानी संगीत पद्धति (क्रमिक पुस्तक मलिका ६ भागों में), भातखण्डे संगीत शास्त्र ४ भागों में, अभिनव राग मञ्जरी, लक्ष्य संगीत, स्वरमालिका आदि.

इस प्रकार भातखण्डे जी जीवन भर संगीत की सेवा करते रहे और अंत में १९ सितम्बर १९३६ को उनका स्वर्गवास हो गया. 

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Saturday, December 28, 2019

तानसेन - जीवनी

तानसेन का असली नाम तन्ना मिश्र था और पिता का नाम मकरंद पांडे। कुछ लोग पांडे जी को मिश्र भी कहते थे। तानसेन की जन्मतिथि के विषय में अनेक मत हैं। अधिकांश विद्वानों के मतानुसार उनका जन्म 1532 ईसवी में ग्वालियर से 7 मील दूर बेहट ग्राम में हुआ था। उनके जन्म के विषय में यह किवदंती है कि बहुत दिनों तक मकरन्द पांडे संतानहीन थे। अतः वे बहुत चिंतित रहा करते थे। मोहम्मद गौस नामक फकीर के आशीर्वाद से पुत्र उत्पन्न हुआ जिसका नाम तन्ना रखा गया। अपने पिता के एकमात्र संतान होने के कारण उनका पालन पोषण बड़े लाड़ प्यार में हुआ। फलस्वरूप अपनी बाल्यावस्था में वे बड़े नटखट और उद्दंड रहे। प्रारंभ से ही तन्ना में दूसरों की नकल करने की बड़ी क्षमता थी। बालक तन्ना पशु पक्षियों तथा जानवरों की विभिन्न बोलियों की सच्ची नकल करता था और नटखट प्रकृति का होने के कारण हिंसक पशुओं की बोली से लोगों को डराया करता था। इसी बीच स्वामी हरिदास से उनकी भेंट हो गई।

मिलने की भी एक मनोरंजक कथा है। एक बार स्वामी जी अपनी मंडली के साथ पास के जंगल से गुजर रहे थे। नटखट तन्ना ने एक पेड़ की आड़ लेकर शेर की आवाज निकालकर सबको डरा दिया। स्वामी हरिदास उनकी इस प्रतीभा से अत्यधिक प्रभावित हुए और उनके पिता से तानसेन को संगीत सिखाने के लिए मना लिया और अपने साथ तानसेन को वृंदावन ले गए।

इस प्रकार तानसेन स्वामी हरिदास के साथ रहने लगे और 10 वर्ष तक शिक्षा प्राप्त करते रहें अपने पिता की अस्वस्थता सुनकर   तानसेन अपनी मातृभूमि ग्वालियर चले गये। कुछ दिनों के बाद उनके पिता ने तानसेन को बुलाकर कहा कि तुम्हारा जन्म मुहम्मद गौस के आशीर्वाद स्वरुप हुआ है। अत: उनकी आज्ञा की अवहेलना कभी न करना। तब स्वामी हरिदास से आज्ञा लेकर तानसेन मुहम्मद गौस के पास रहने  लगे। वहां कभी-कभी ग्वालियर की रानी मृगनयनी का गाना सुनने के लिए जाया करते थे। वहां उसकी दासी हुसैनी की सुन्दरता और संगीत ने तानसेन को अपनी ओर आकर्षित किया।  तानसेन के चार पुत्र हुए, सूरत सेन, शरतसेन, तरंगसेन, बिलास खां और सरस्वती नाम की एक पुत्री।

जब तानसेन एक अच्छे गायक हो गए तो रीवानरेश रामचंद्र ने उन्हें राज्य गायक बना लिया। महाराज रामचंद्र और अकबर में घनिष्ट मित्रता थी। महाराज रामचंद्र ने अकबर को प्रशन्न करने के लिए गायक तानसेन को उन्हें उपहार स्वरूप  भेंट कर दिया। अकबर स्वयं भी संगीत का प्रेमी था। वह उन्हें पाकर अत्यधिक प्रसन्न हुआ और अपने नवरत्नों में उन्हें शामिल कर लिया। धीरे-धीरे अकबर तानसेन को बहुत मानने लगा फलस्वरूप दरबार के अन्य गायक उनसे जलने लगे। उन लोगों ने तानसेन को खत्म करने के लिये एक युक्ति निकाली। सभी गायकों ने अकबर बादशाह से प्रार्थना किया कि तानसेन से दीपक राग सुना जाए और यह देखा जाए कि दीपक राग में कितना प्रभाव है। तानसेन के अतिरिक्त को दूसरा गायक इसे गा नहीं सकेगा यह बात बादशाह के दिमाग में जम गई। उसने तानसेन को दीपक राग गाने को बाध्य किया। तानसेन अकबर को बहुत समझाया कि दीपक राग के गाने का परिणाम बहुत बुरा होगा किंतु बादशाह के सामने उन्हों दीपक राग गाने के लिये बाध्य होना पड़ा। दीपक राग गीते हीं गर्मी बढ़ने लगी और चारों ओर से मानो अग्नि की लपटें निकलने लगी। श्रोतागण तो गर्मी के मारे भाग निकले किंतु तानसेन का शरीर प्रचंड गर्मी से जलने लगा। उसकी गर्मी केवल मेघ राग से समाप्त हो सकती थी। कहा जाता है कि तानसेन की पुत्री सरस्वती ने राग मेघ गाकर अपने पिता की जीवन रक्षा की। बादशाह को अपनी हठ पर बड़ा पश्चाताप हुआ।

बैजू बावरा तानसेन का समकालीन था। कहा जाता है कि एक बार दोनों गायकों में प्रतियोगिता हुई और तानसेन की हार हुई। इसके पूर्व तानसेन ने घोषणा करा दी थी कि उसके अतिरिक्त राज्य में कोई भी व्यक्ति गाना न गाये और जो गाएगा तानसेन के साथ उसकी प्रतियोगिता होगी। जो हारेगा उसे उसी समय मृत्यु दंड मिलेगा। कोई गायक उसे हरा नहीं सका। अंत में बैजू बावरा ने उसे परास्त किया। शर्त के अनुसार तानसेन को मृत्युदण्ड मिलना चाहिए था किंतु बैजू बावरा ने उसे क्षमा कर अपने विशाल ह्रदय का परिचय दिया।

तानसेन ने अनेक रागों की रचना की जैसे दरबारी कान्हड़ा, मियां की सारंग, मियां की तोड़ी, मियां मल्हार आदि। कहा जाता है कि  तानसेन ने बाद में मुसलमान धर्म स्वीकार कर लिया। उसने ऐसा क्यों किया, इस विषय में विद्वानों के अनेक मत हैं। कुछ का कहना है कि गुरु की आज्ञा से वह मुसलमान हो गए और कुछ का कहना है कि अकबर की पुत्री से उसकी विवाह हुई थी इसलिए उसने मुसलमान धर्म स्वीकार कर लिया। कुछ विद्वानों का यह भी मत है कि तानसेन मुसलमान हुए ही नहीं। उसने फकीर गुलाम गौस की स्मृति में नवीन रागों के नाम के आगे मियां शब्द जोड़ दिया जैसे मियां मल्हार आदि सन  1585 ईसवी में दिल्ली में तानसेन की मृत्यु हुई और ग्वालियर में गुलाम गौस के कब्र के पास उनकी समाधि बनाई गई।

Friday, February 22, 2019

Mera jeevan tere hawale : Mr. Ashok Kumar

Bhajan - Mera jeevan tere hawale by Mr. Ashok Kumar, PGT (Music), M. N. D. +2 High School Raipur Ujiarpur,  Samastipur.

Tere naam Ka deewana : Mr. Ashok Kumar

Gajal - Tere naam Ka deewana by Mr. Ashok Kumar, PGT (Music), M. N. D. +2 High School Raipur Ujiarpur,  Samastipur.

Thursday, February 14, 2019

सप्तक : परिभाषा


कण : परिभाषा

किसी दूसरे  को स्पर्श कर के जब कोई स्वर बजाया जाता है तब उस  किये हुए स्वर को कण कहा जाता है।  ये दो प्रकार के होते हैं:
१. निचे के स्वर से ऊपर के स्वर तक जाते हैं:
     रे       ग     प 
     ग,      म,    सां 
२. यह कण ऊपर  के स्वर को लेकर नीचे  के स्वर पर आने से होता है:
     ग        म        नि 
    सा,      ग,        प 


किसी स्वर की उत्पत्ति करते समय जब उस स्वर की अतिरिक्त किसी अन्य स्वर को शीघ्रता से स्पर्श करते हुए स्वरोच्चारण करते हैं तो उस (शीघ्रता से ) स्पर्श किये गए स्वर को कण स्वर कहते हैं।  इस प्रकार मूल स्वर का उच्चारण आकर्षक बन जाता है।  

Sunday, February 10, 2019

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राग अल्हैया बिलावल का परिचय

थाट - बिलावल                जाति - षाडव - सम्पूर्ण
वादी - धैवत                    संवादी - गंधार
वर्ज्य स्वर - आरोह में म   
विकृत स्वर - अवरोह में वक्र कोमल नि

आरोह - सा, ग रे ग प, ध नि सां                              
अवरोह - सां नि ध प, घ नि ध प, म ग म रे सा
पकड़ - ग प ध नि ध प, म ग म रे
समय - दिन का प्रथम प्रहर

सम्प्रकृति राग - बिलावल

विशेषताये

  1. यह बिलावल का एक प्रकार है
  2. आरोह-अवरोह दोनों में शुद्ध नि प्रयोग करते हैं.
  3. कोमल नि केवल अवरोह में इस प्रकार प्रयोग किया जाता है - सां नि ध प, ध नि ध प
  4. राग की चलन उत्तरांग में अधिक होती है.
  5. अवरोह में ग स्वर वक्र प्रयोग होता है, जैसे - म ग म रे
इस राग पर आधारित कुछ बॉलिवुड गाने
१. भोर आई गया अन्धियारा - बावर्ची

२. सारे के सारे ग म को लेकर गाते चले - परिचय



राग भीमपलासी का परिचय

राग भीमपलासी का परिचय
जब काफी के मेल में, आरोहन रेध त्याग |
तृतीय प्रहार दिन ग नि कोमल, मानत म सा संवाद ||

थाट - काफी                         जाति - औडव-सम्पूर्ण
वादी - म                              संवादी - सा
आरोह - नि सा  म, प, नि, सां
अवरोह - सां नि ध प, म प  म, ग रे सा
पकड़ - नि सा म, म प  म,  रे सा

न्यास के स्वर - सा,  म प
सम्प्रकृति राग - बागेश्री

विशेषतायें

  1. इसमें ग नि कोमल तथा अन्य स्वर शुद्ध प्रयोग किया जाता है.
  2. आरोह में रे ध वर्जित है.
  3. अवरोह में सातों स्वरों का प्रयोग होता है.
  4. इसमें सा म और म  की संगति बार-बार दिखाते हैं.
  5. नि के साथ सा के तथा  के साथ म का मींड दिखाने की परंपरा है.
  6. यह करुण प्रकृति का राग है. इसमें बड़ा ख्याल, छोटा ख्याल, तराना, ध्रुपद-धमार आदि सभी गाये बजाये जाते हैं.

इस राग पर आधारित कुछ बॉलिवुड गाने
१. दिल के टुकड़े टुकड़े कर के - दादा
२. दिल में तुझे बिठाके - फकीरा
३. ए री मैं तो प्रेम दिवानी 
४. ए ली रे ए ली क्या है ये पहेली - यादें
५. किस्मत से तुम हमको मिले हो - पुकार
६. नैनों में बदरा छाये - मेरा साया


राग वृन्दावनी सारंग का परिचय

राग वृन्दावनी सारंग का परिचय
वर्ज्य करे धैवत गंधार, गावत काफी अंग |
दो निषाद रे प संवाद, है वृन्दावनी सारंग ||

थाट - काफी                     जाति - औडव औडव
वादी - रे                           संवादी - प
आरोह - ऩि सा रे म प नि सां                                 
अवरोह - सां नि प म रे सा
पकड़ - रे म प नि प, म रे, ऩि सा
समय - मध्यान्ह काल

न्यास के स्वर - सा, रे, प
सम्प्रकृति राग - सूर मल्हार

मतभेद - स्वर की दृष्टि से यह राग खमाज थाट जन्य माना जा सकता है, किन्तु स्वरुप की दृष्टि से इसे काफी थाट का राग मानना सर्वथा उचित है.

विशेषता

  1. इसके अतिरिक्त सारंग के अन्य प्रकार हैं - शुद्ध सारंग, मियाँ की सारंग, बड़हंस की सारंग, सामंत सारंग
  2. इसके आरोह में शुद्ध और अवरोह में कोमल नि का प्रयोग किया जाता है.
  3. ऐसा कहा जाता है की इस राग की रचना वृन्दावन में प्रचलित एक लोकगीत पर आधारित है.
  4. इसमें बड़ा ख्याल, छोटा ख्याल और तराना आदि गाये जाते हैं.


थाट : परिभाषा

थाट स्वरों की एक विशेष रचना होती है जिसमे से राग की बुनियाद बनती है. थाट के सम्बन्ध में निम्नलिखित बाते ध्यान रखी जाति है -
१. थाट में हमेशा सातों स्वर होते हैं,
२. थाट में रंजकता होनी आवश्यक नहीं है
३. थाट के लक्षण बताने के लिए अवरोह की कोई आवश्यकता नहीं है.


Saturday, February 9, 2019

वर्ण : परिभाषा

गाने की प्रत्यक्ष क्रिया या स्वरों की विविध चलन को वर्ण कहते हैं. ये चार प्रकार के होते हैं। अभिनव राग मंजरी में कहा गया है, "गान क्रियोच्यते वर्ण:" अर्थात् गाने की क्रिया को वर्ण कहते हैं।

१. स्थाई वर्ण - जब कोई स्वर एक से अधिक बार उच्चारित किया जाता है तो उसे स्थायी वर्ण कहते हैं, जैसे - रे रे, ग ग ग, म म म आदि।
२. आरोही वर्ण - स्वरों के चढ़ते हुये क्रम को आरोही वर्ण कहते हैं जैसे- सा रे म ग प ध नी
३. अवरोही वर्ण - स्वरों के उतरते हुये क्रम को अवरोही वर्ण कहते हैं जैसे - नि ध प म ग रे सा

  • ४. संचारी वर्ण - उपर्युक्त तीनों वर्णों के मिश्रित रूप को संचारी वर्ण कहते हैं । इसमें कभी तो कोई स्वर ऊपर चढ़ता है तो कभी कोई स्वर बार-बार दोहराया जाता है। दूसरे शब्दों में संचारी वर्ण में कभी आरोही, कभी अवरोही और कभी स्थाई वर्ण दृष्टिगोचर होता है जैसे - सा सा रे ग म प प म ग रे सा।

विवादी : परिभाषा

जिस स्वर को राग में लगाने से राग का स्वरुप बिगड़ जाये, अर्थात  राग में न प्रयोग किए जाने वाले स्वरों को विवादी कहते हैं. इसे राग का शत्रु भी कहते हैं. प्रचार में यह वर्ज्य या वर्जित स्वर कहलाता है.
कभी-कभी राग की सुंदरता बढ़ाने के लिए विवादी स्वर का क्षणिक प्रयोग भी किया जाता है ऐसा करते समय बड़ी सावधानी की आवश्यकता होती है अन्यथा राग के बिगड़ने की संभावना रहती है।
१. विवादी स्वर का उपयोग उस समय करना चाहिए जबकि राग के रंजकता में वृद्धि हो। केवल प्रयोग के लिए प्रयोग न करना चाहिए अन्यथा राग हानि होगी। बिहारग में तीव्र म विवादी स्वर है विवादी स्वर के प्रयोग करने से राग हानि नहीं होती बल्कि उसके गलत प्रयोग करने से राग हानि अवश्य होती है।
२. विवादी स्वर का अल्प प्रयोग होना चाहिए। ऐसा न करने से विवादी अनुवादी हो जाएगा।
३. विवादी के प्रयोग से राग का मूल स्वरूप किसी भी अंश में नहीं बिगड़ना चाहिए।

अनुवादी : परिभाषा

वादी और संवादी को छोड़कर बाद की नियमित स्वरों को अनुवादी कहते हैं. इन्हें राग का सेवक कहते हैं.
 उदाहरण के लिए भैरवी राग में म-सा के अतिरिक्त जो क्रमशः वादी-संवादी हैं, राग के शेष स्वर अनुवादी कहलाते हैं। अनुवादि स्वरों को अनुचर या सेवक कहा गया है।
राग यमन में वादी ग, संवादी नी और शेष स्वर - सा रे तिव्र-म, प, ध स्वर अनुवादी हैं।
राग खमाज में ग-वादी, नी-संवादी और शेष स्वर - सा, रे, ग, प और ध अनुवादी हैं।


The notes in a raga that neither Vadi nor, Samvadi are called Anuvadi notes. They are often called companion notes.

आभोग : परिभाषा

गाने के चौथे पद को आभोग कहते हैं. इसका रूप अंतरे से कुछ भिन्न होता है.

संचारी : परिभाषा

गाने के तीसरे पद को संचारी कहते हैं. इस पद से स्थाई के ऊपर वाले भाग का विशेष बोध होता है.

अंतरा : परिभाषा

गाने के दुसरे पद को अंतरा कहते हैं. यह पद मध्य-सप्तक से आरम्भ होकर तार-सप्तक के मध्य तक जाता है.

स्थाई : परिभाषा

गाने के प्रथम पद को स्थाई कहते हैं. इसमें राग का स्पष्ट रूप प्रकट हो जाता है और तार-सप्तक के स्वरों का उपयोग कम होता है.

गमक : परिभाषा

स्वरस्य कम्पो गमक: श्रोतृचित्तसुखावह:।


सितार में गमक मिठास उत्पन्न करने के लिए एक उत्तम क्रिया है। मींड, जमजमा, मुर्की एवं गिटकिड़ी आदि सभी गमक के हीं प्रकार हैं। परन्तु जब किसी स्वर की श्रुतियों को उससे आगे-पीछे की श्रुतियों में इस प्रकार मिला दिया जाये की आगे-पीछे के स्वर सुनाई न देकर, जिस स्वर पर यह क्रिया कर रहे हैं, केवल वही स्वर सुनाई दे तो इस क्रिया को गमक कहते हैं. 

नीचे स्वर से हिलते हुये ऊंचे स्वर पर जाने से गमक होता है।  यह दो स्वरों से उत्पन्न होता है, और मीड़ के सहीरे बजाया जाता है। 
गमक ७ प्रकार के होते हैं -
स्फुरितं कम्पितं लीनं स्तिमितांदोलितावपि
आहतं त्रिकभिन्नं च सप्तैते गमक: स्मृता।।


गिटकिड़ी : परिभाषा

सितार वादन में मुर्की बजाते हुए जब अंत में मध्यमा अंगुली से जमजमा की भांति किसी स्वर पर प्रहार किया जाता है तो मिजराब के एक हीं ठोकर से चार स्वर की ध्वनि सुनाई देती है जैसे की 'रेसानिसा'

मुर्की : परिभाषा

सितार वादन में जब एक हीं मिजराब के ठोकर में बिना मींड के तीन खरे स्वर बजाये जाएँ तो इस क्रिया को मुर्की कहते है. जैसे 'रेसानी'. इस क्रिया में रे पर मिजराब से ठोकर देते समय तर्जनी सा और मध्यमा रे के परदे पर रहेगी. रे पर मिजराब लगते हीं मध्यमा को तुरंत तार पर से उठाने से 'रेसा' की ध्वनि उत्पन्न होगी, एवं तर्जनी तुरंत घसीट कर नि के परदे पर पहुँचाने से 'रेसानी' की ध्वनि सुने देगी. 

जमजमा : परिभाषा

सितार वादन में किसी भी स्वर पर तर्जनी द्वारा बाज के तार को दबाकर उससे अगले परदे पर मध्यमा अंगुली को जोर से मरने पर जिस स्वर पर मध्यमा पड़ेगी, उसी स्वर की हल्की ध्वनि उत्पन्न होगी. इसे बजाने में दुसरे स्वर पर मिजराब द्वारा ठोकर नहीं दी जाएगी बल्कि केवल मध्यमा ऊँगली से दुसरे स्वर के परदे पर प्रहार की जाएगी. जब इस क्रिया को एक या अधिक बार किया जाता है तो इसे जमजमा कहते हैं.

कृन्तन : परिभाषा

इसकी यन्त्र संगीत में प्रयोग होता है। यह दो, तीन, चार स्वर से उत्पन्न होता है। यह एक स्वर का सम्बन्ध दूसरे स्वर से बनाये रखता है। ऊंचे स्वर से नीचे स्वर पर आने से दो आवाज होती है, उसे कृन्तन कहते हैं।  सितार वादन में मिजराब के एक हीं ठोकर में दो-तीन अथवा चार स्वरों को बिना मींड के केवल अँगुलियों के सहायता से निकलने की क्रिया को कृन्तन कहते हैं. कृन्तन में स्वरों की संख्या चार से अधिक भी हो सकती है.

विलोम मींड : परिभाषा

यदि सा के परदे पर पूर्व में हीं बिना तार को ठोकर दिए इतना खिंच जाये की आघात होने पर रे का स्वर सुने परे और फिर खींचे हुए तार को धीरे-धीरे ढीला करते हुए वापस सा के परदे पर आ जाने से सा का स्वर सुने पड़ने लगे तो ऐसे अवरोही क्रम में रे से सा की ध्वनि उत्पन्न हो तो इसे विलोम मींड कहते हैं. इस प्रकार की मींड में तार खीचने के बाद मिजराब से ठोकर दी जाति है.

अनुलोम मींड : परिभाषा

यदि सा पर मिजराब लगाकर दूसरी ऊँगली को रे पर न ले जाकर उसी सा के परदे पर हीं तार को इतना खींची जाय की रे का स्वर सुने देने लगे इस प्रकार आरोही के लिए खिंची गयी मींड को अनुलोम मींड कहते हैं. इस क्रिया में सा से रे की ध्वनि पहुंचने में ध्वनि कहीं भी खंडित नहीं होती है. 

मींड : परिभाषा

सितार में ही नहीं बल्कि समस्त भारतीय संगीत में मींड एक महत्वपूर्ण क्रिया है. संगीत में मिठास उत्पन्न करने वाली इस जैसी कोई अन्य क्रिया नहीं है. जब सितारवादक एम् ऊँगली से सा पर रखकर मिजराब लगते हैं और दूसरी ऊँगली से रे बजाते हैं अर्थात दोनों स्वरों पर ठोकर देकर बजाते हैं तो इसे खड़ा स्वर बजाना कहते हैं. किन्तु यदि एक स्वर पर मिजराब द्वारा ठोकर देने के बाद दुसरे स्वर की ध्वनि निकाली जाये तो इसे मींड कहते हैं.

Wednesday, February 6, 2019

राग यमन विशेष

Raga yaman - by NCERT Official


Raga yaman and Bollywood songs


Raga yaman - Alap on Sitar

Friday, January 25, 2019

तन्त्र वाद्य - चतुर्थ वर्ष (सीनियर डिप्लोमा)

चतुर्थ वर्ष (सीनियर डिप्लोमा)


क्रियात्मक 
  1. पिछले वर्षों के पाठ्यक्रमों का विशेष अभ्यास. स्वर-ज्ञान, लय-ज्ञान और राग-ज्ञान में निपुणता.
  2. वाद्य मिलाने का पूर्ण अभ्यास.
  3. अंकों या स्वरों के सहारे ताली देकर विभिन्न लयों का प्रदर्शन जैसे-दुगुन (१ मात्रा में २ मात्रा बोलना), तिगुन (१ में ३), चौगुन (१ में ४), आड़ (२ में ३), आड़ का उल्टा (३ में २), पौनगुन (४ में ३), सवागुन (४ में ५)
  4. गिटकिरी, मुर्की, खटका, कण, कृन्तन, जमजमा, लाग-डाट, घसीट आदि बजने का अभ्यास. कुछ कठिन मींड जैसे = जमजमा की मींड, मुर्की की मींड, गिटकिरी की मींड, सूत की मींड आदि निकालना.
  5. सुन्दर आलाप, जोड़ और झाले का विशेष अभ्यास.
  6. केदार, पटदीप, जैजैवंती,पुरिया, मारवा, कामोद, दरबारी-कान्हड़ा,, अड़ाना तथा देशकार रागों का पूर्ण-ज्ञान और प्रत्येक में एक-एक राजखानी गत या छोटा ख्याल सुन्दर आलाप, कठिन तान, तोड़ों, और झाला सहित.
  7. केदार, तोड़ी, मुल्तानी, पुरिया और दरबारी कान्हड़ा रागों का पूर्ण आलाप-जोड़ तथा एक-एक मसितखानी गत या बड़ा ख्याल कठिन और सुन्दर तान तोड़ों सहित.
  8. टप्पा और ठुमरी के ठेकों का साधारण ज्ञान. जत और आड़ा-चारताल का पूर्ण ज्ञान और इनको विभिन्न लयों में ताल देकर बोलना.
  9. बजाकर रागों में समता-विभिन्नता दिखाना.
  10. छोटे-छोटे स्वर-समूहों द्वारा राग पहिचान.


शास्त्र

  1. राग-रागिनी पद्धति, तान के विभिन्न प्रकारों का विस्तृत वर्णन विवादी स्वर का प्रयोग, निबद्ध गान के प्राचीन प्रकार (प्रबंध-वास्तु आदि) धातु, अनिबाध गान, अध्वदर्शक स्वर.
  2. २२ श्रुतियों का स्वरों में विभाजन (आधुनिक और प्राचीन-मतों का तुलनात्मक अध्ययन), खींचे हुए तार की लम्बाई का नाद के ऊँचे-निचेपन से सम्बन्ध.
  3. छायालग और संकीर्ण राग, परमल प्रवेशक राग, रागों का समय-चक्र, कर्नाटकी और हिन्दुस्तानी सन्गिईत पद्धतियों के स्वरों की तुलना. राग का समय निश्चित करने में वादी-संवादी, पूर्वांग, उत्तरांग और अध्वदर्शक-स्वर का महत्व.
  4. उत्तर भारतीय सप्तक से ३२ थाटों की रचना. आधुनिक थाटों के प्राचीन नाम, अल्पत्व-बहुत्व, तिरोभाव तथा आविर्भाव.
  5. रागों का तुलनात्मक अध्ययन, राग का स्वर-विस्तार लिखने तथा राग पहिचान में निपुणता.
  6. विभिन्न तालों की दुगुन, तिगुन तथा चौगुन प्रारंभ करने का स्थान गणित द्वारा निकलने की विधि विभिन्न लायकारियों को ताल-लिपि में लिखने का अभ्यास जैसे-दुगुन (१ मात्रा में २ मात्रा बोलना), तिगुन (१ में ३), चौगुन (१ में ४), आड़ (२ में ३), आड़ का उल्टा (३ में २), पौनगुन (४ में ३), सवागुन (४ में ५)
  7. विष्णु दिगंबर और भातखंडे दोनों स्वर्लिपियों का तुलनात्मक अध्ययन. दोनों स्वर्लिपियों में आलाप, गत, तान, तोड़ा, झाला लिखने के अभ्यास.
  8. विभिन्न भारतीय वाद्यों (तत्, वितत्, घन और सुषिर) का विस्तृत वर्णन और उनका इतिहास. वाद्यों को बजने की विभिन्न बैठक तथा उनके गुण और दोष. वाद्य मिलाने के विभिन्न प्रकार. मसितखानी और रजाखानी गत बजाने के नियम. विभिन्न तन्द्रा वाद्यों (सितार, सरोद, इसराज, बेला, सारंगी, वीणा) की विशेषताएं.
  9. निम्नलिखित शब्दों की परिभाषाएं - लाग-डाट, पुकार, लड़गुथाव, छूट, तार-परन, कृन्तन.
  10. भरत, अहोबल, व्यंकटमखी तथा मानसिंह तोमर का जीवन परिचय तथा संगीत कार्य.

तन्त्र वाद्य - तृतीय वर्ष

तृतीय वर्ष (तन्त्र वाद्य)
क्रियात्मक परीक्षा १०० अंकों की तथा शास्त्र का एक प्रश्न-पत्र ५० अंकों का. पिछले वर्षों का सम्पूर्ण पाठ्यक्रम भी सम्मिलित है.

क्रियात्मक 


  1. प्रथम और द्वितीय वर्षों की पाठ्यक्रम की विशेष जानकारी और तैयारी.
  2. स्वर-ज्ञान में विशेष उन्नति.
  3. अन्य कठिन अलंकारों और तानों को विभिन्न लयकारियों (ठाह, दून, तिगुन, और चौगुन) में विभिन्न बोलों में और तीनों सप्तकों में पूर्ण अभ्यास. आड़-लय का केवल प्रारंभिक ज्ञान.
  4. वाद्य मिलाने का प्रारंभिक अभ्यास.
  5. मींड, सूत, घसीट, जमजमा, खटका, मुर्की, स्पर्श, स्वर आदि निकालने का आरंभिक अभ्यास. प्रथम और द्वितीय वर्ष के रागों के स्वर-विस्तार में इन सब चीजों का साधारण प्रयोग.
  6. बागेश्री, मालकोस, जौनपुरी, तथा पूर्वी, रागों का साधारण आलाप, जोड़, और एक-एक विलंबित गत मसितखानी अथवा बड़ा-ख्याल (ख्याल-अंग बजाने वालों के लिए) दून और चौगुन लयों में सुन्दर तान, तोड़ों, सहित. हाथ की सफाई और तैयारी पर विशेष ध्यान रखना चाहिए.
  7. पूर्वी, तोड़ी, मुल्तानी, दुर्गा, कलिंङ्गड़ा, तिलङ, पीलू, तिलक कामोद, और सोहिनी रागों का पूर्ण-ज्ञान, स्वर विस्तार (साधारण और मींड-सूत द्वारा) और प्रत्येक में एक-एक रजाखानी-गत अथवा छोटा-ख्याल सुन्दर तान, तोड़ों और झाला सहित.
  8. दीपचंदी, धमार, झुमरा तथा तिलवाड़ा तालों के ठेकों को ठाह, दुगुन, तिगुन और चौगुन लयों में बोलना.
  9. राग पहचान में निपुणता.


शास्त्र

  1. प्रथम और द्वितीय वर्षों के कुल पारिभाषिक शब्दों का विस्तृत ज्ञान, २२ श्रुतियों का सात शुद्ध स्वरों में विभाजन (आधुनिक मत), आन्दोलन की चौड़ाई और उसका नाद से छोटे-बड़ेपन से सम्बन्ध, थाट और राग के विशेष नियम. श्रुति और नाद में सूक्ष्म भेद. व्यंकटमखी के ७२ मेलों की गणितानुसार रचना और एक थाट से ४८४ रागों की उत्पत्ति. स्वर और समय के अनुसार रागों के तीन वर्ग (रे-ध कोमल वाले राग, रे-ध शुद्ध वाले राग, और ग-नि कोमल वाले राग), संधिप्रकाश राग, तानों के प्रकार.
  2. वाद्य सम्बन्धी पारिभाषिक शब्दों एवं विषयों का पूर्ण ज्ञान, तरब, जोड़, अनुलोम तथा विलोम, मींड, गमक, सूत, घसीट, मुर्की, गिटकिरी, खटका, तंत्र, तन्त्रकारों के गुण-दोष, कस्बी तथा अताई.
  3. रागों का पूर्ण परिचय एवं तुलनात्मक अध्ययन स्वर-विस्तार सहित.
  4. आलाप, गत, तान तोड़ा, झाला आदि को स्वरलिपि में लिखने का पूर्ण अभ्यास.
  5. इस वर्ष तथा पिछले वर्षों के तालों का पूर्ण ज्ञान. उनके ठेकों को दुगुन, तिगुन और चौगुन लयों में ताल-लिपि में लिखना. किसी ताल अथवा गत या गीत को दुगुन आदि आरंभ करने के स्थान को भिन्न-भिन्न स्थानों द्वारा निकालने की रीति.
  6. कठिन स्वर-समूहों द्वारा राग पहिचान.
  7. भातखंडे तथा विष्णु दिगंबर स्वर-लिपि पद्धतियों का पूर्ण-ज्ञान.
  8. शारङदेव तथा स्वामी हरिदास को संक्षिप्त जीवनियां तथा उनके संगीत कार्यों का परिचय.


Friday, January 4, 2019

Ghunghroo for indian classical dance


अलंकार : परिभाषा

स्वरों की नियमानुसार  चलन को अलंकार कहते हैं. अलंकार में कई कड़ियाँ होती हैं जो आपस में एक दूसरे से जुड़ी होती है. प्रत्येक अलंकार में मध्य सा से तार सा तक आरोही वर्ण और तार सा के मध्य सा तक अवरोही वर्ण हुआ करता है. 'संगीत दर्पण' के अनुसार इसकी परिभाषा इस प्रकार दी गई है:
'विशिष्ट वर्ण सन्दभम् लंकार प्रचक्षते'
अर्थात नियमित वर्ण-समूह को अलंकार कहते हैं. अलंकार का अवरोह, आरोह का ठीक उल्टा होता है, जैसे:-
आरोह - सारेग, रेगम, गमप, पधनी, धनिसा.
अवरोह - सानिध, निधप, धपम, पमग, मगरे, गरेसा.
इसी प्रकार अनेक अलंकारों की रचना हो सकती है. अलंकार को पलटा भी कहते हैं. 

Thursday, December 27, 2018

कत्थक नृत्य सिलेबस भाग १

Katthak dance Syllabus


by Shri Harish Chandra Srivastava

It is also useful for the Kathak dance Students of High School, Intermediate and B.A. Examinations of different Boards and Universities of India. Description: This text book of Kathak dance has been written according to the syllabus of Junior and Senior Diploma courses of Prayag Sangit Samiti, Allahabad, Praveshika and Madhyama courses of A.B. Gandharva Mahavidyalaya Mandal, Bombay, Prathama and Madhyama courses of Bhatkhande Sangit Vidyapeeth, Lucknow and Indira Kala Sangit Vishwa-Vidyalaya, Khairagarh and Prarambhik and Nritya Bhushan Courses of Pracheen Kala Kendra, Chandigarh.


Wednesday, December 26, 2018

राग भैरवी का परिचय

राग भैरवी का परिचय
''''रे ग ध नि कोमल राखत, मानत मध्यम वादी।
प्रात: समय जाति संपूर्ण, सोहत सा संवादी॥''''
कोमल स्वर - रिषभ, गंधार, धैवत और निषाद।
शुद्ध स्वर - षडज, मध्यमा, पंचम।
जाति - सम्पूर्ण-सम्पूर्ण
थाट - भैरवी
वादी - मध्यमा
संवादी - षडज
आरोह- सा रे॒ ग॒ म प ध॒ नि॒ सां।
अवरोह- सां नि॒ ध॒ प म ग॒ रे॒ सा।
पकड़- म, ग॒ रे॒ ग॒, सा रे॒ सा, ध़॒ नि़॒ सा।
विशेषता -
विशेष - यह भैरवी थाट का आश्रय राग है। हालांकि इस राग का गाने का समय प्रातःकाल है पर इस राग को गाकर महफिल समाप्त करने की परंपरा प्रचार में है। आजकल इस राग में बारह स्वरों का स्वतंत्र रूप से प्रयोग करने का चलन बढ़ गया है जिसमें कलाकार कई रागों के अंगों का प्रदर्शन करते हैं। यह राग भाव-अभिव्यक्ति के लिए बहुत अनुकूल तथा प्रभावकारी है। इसके पूर्वांग में करुण तथा शोक रस की अनुभूति होती है। और जैसे ही पूर्वार्ध और उत्तरार्ध का मिलाप होता है तो इस राग की वृत्ति उल्हसित हो जाती है।
इस राग के इतने लचीले, भावपूर्ण तथा रसग्राही स्वर हैं की श्रोतागण मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। इस राग का विस्तार मध्य तथा तार सप्तक में किया जाता है।
इस राग में जब शुद्ध रिषभ का प्रयोग किया जाता है तो इसे सिंधु-भैरवी कहा जाता है।
इस राग की प्रकृति चंचल है अतः इसमें ख्याल नही गाये जाते। इसमें भक्ति तथा श्रृंगार रस की अनुभूति भरपूर होती है अतः इसमें भजन, ठुमरी, टप्पा, ग़ज़ल, आदि प्रकार गाये जाते हैं।
राग भैरवी आधारित फिल्मी गाने -
गूंज उठी शहनाई - दिल का खिलौना हाय टूट गया
सीमा - सुनो छोटी सी गुड़िया की लंबी कहानी
बैजू बावरा - तू गंगा की मौज मैं जमुना की धारा
सत्यम शिवम सुन्दरम् - सत्यम शिवम सुन्दरम,
दाग - ऐ मेरे दिल कहीं और चल
आवारा - आवारा हूं या गर्दिश में मैं आसमान का तारा
           - घर आया मेरा परदेशी
रोटी कपड़ा और मकान - महंगाई मार गई
दो कलियां - बच्चे मन के सच्चे
बरसात - बरसात में हम से मिले तुम सजन,
           - छोड़ गये बालम
दो बदन - भरी दूनिया में आखिर दिल
सत्यम शिवम सुन्दरम - भोर भये पनघट पे
संगम - बोल राधा बोल संगम, दोस्त दोस्त ना रहा
जंगली - चाहे कोई मुझे जंगली कहे
छलिया - छलिया मेरा नाम
अमर प्रेम - चिंगारी कोई भड़के तो
सुर संगम - धन्य भाग सेवा का अवसर पाया
गैम्बलर - दिल आज शायर है
दिल अपना और प्रित पराई - दिल अपना और प्रित पराई
गंगा जमुना - दो हंसों का जोड़ा
तीसरी कसम - दुनिया बनाने वाले
कुदरत - हमें तुमसे प्यार कितना
जिस देश में गंगा बहती है - होठों पे सच्चाई रहती है
              - मेरा नाम राजू घराना
अमर - इन्साफ का मन्दिर है ये भगवान का घर है
भरोसा - इस भरी दुनिया में कोई
माया - जा रे, जारे उर जा रे पंछी
शाह जहां - जब दिल हीं टूट गया
मेरा नाम जोकर - जीना यहां मरना यहां
                      - कहता है जोकर सारा जमाना
सहेली - जिस दिल में बसा था प्यार तेरा
झनक झनक पायल बाजे - जो तुम तोड़ो पिया
संत ज्ञानेश्वर - ज्योत से ज्योत जगाते चलो
ऐतबार - किसी नज़र को तेरा इंतजार
दिल हीं तो है - लागा चुनरी में दाग
आलाप - माता सरस्वती शारदा
बसन्त बहार - मैं पिया तेरी तु माने या ना माने
उपकार - मेरे देश की धरती सोना उगले
श्री ४20 - मेरा जूता है जापानी
            - प्यार हुआ इकरार हुआ है
            - रमैया वस्तावैया
द लिजेन्ड ऑफ भगत सिंह - मेरा रंग दे बसन्ती चोला
कसमे वादे - मिले जो कड़ी कड़ी
पं० भीमसेन जोशी - मिले सुर मेरा तुम्हारा
किनारा - मीठे बोल बोल
जवाब - पूरब न जईयो
दिल भी तेरा हम भी तेरे - मुझको इस रात की तन्हाई
मेरी सूरत तेरी आँखें - नाचे मन मोरा मगन तीद दा
दूज का चांद - फूल गेंदवा न मारो
आह - राजा की आयेगी बारात
अनाड़ी - सबकुछ सीखा हमने न सीखी होशियारी
           - तेरा जाना
साहिब बीबी और गुलाम - साक़िया आज मुझे नीन्द नहीं
गुलामी - सुनाई देती है जिसकी धड़कन
शबनम - तेरी निगाहों पे मर
धूल का फूल - तू हिन्दू बनेगा न मुसलमान बनेगा
मैं चुप रहूंगी - तुम्हीं हो माता पिता तुम्हीं हो
आई मिलन की बेला - तुम्हें और क्या दूं मैं दिल के सिवा
ग़ुलाम अली - दिल ये पागल दिल मेरा क्युं बुझ गया
हरियाली और रास्ता - ये हरियाली और ये रास्ता

Monday, October 22, 2018

थाट और उनके प्रकार (That and their types)

थाट 
मेलः स्वरसमूहः स्याद्रागव्यंजनशक्तिमान  
अर्थात मेल में स्वरों की ऐसी रचना है, जिससे राग बन सके।  इस प्रकार के कुल ७२ हैं परन्तु वे सब हमारे काम के नहीं हैं। 
हिंदुस्तानी संगीत पद्धति में थाट माने गए हैं।

थाट के प्रकार 
वैसे तो थाट की संख्या ७२ है किन्तु मुख्यतः निम्नलिखित १० थाट हैं जो आज-कल व्यवहार में हैं:-

Sl.                    That
1 BILAWAL S R G M P D N S
2 KHAMAJ S R G M P D n S
3 BHAIRAV S r G M P d N S
4 KAFI S R g M P D n S
5 ASAWARI S R g M P d n S
6 BHAIRAVI S r g M P d n S
7 KALYAN S R G m P D N S
8 MARWA S r G m P D N S
9 PURVI S r G m P d N S
10 TODI S r g m P d N S

कोमल स्वर - r g d n
तीव्र स्वर - m
शुद्ध स्वर - S R G M P D N


Trick to remember ten thats
B3 - Bilawal Bhairav Bhairavi
K3 - Kalyan Kafi Khamaj
AMPT - Asawari Marwa Purvi Todi