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Sunday, February 10, 2019

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राग अल्हैया बिलावल का परिचय

थाट - बिलावल                जाति - षाडव - सम्पूर्ण
वादी - धैवत                    संवादी - गंधार
वर्ज्य स्वर - आरोह में म   
विकृत स्वर - अवरोह में वक्र कोमल नि

आरोह - सा, ग रे ग प, ध नि सां                              
अवरोह - सां नि ध प, घ नि ध प, म ग म रे सा
पकड़ - ग प ध नि ध प, म ग म रे
समय - दिन का प्रथम प्रहर

सम्प्रकृति राग - बिलावल

विशेषताये

  1. यह बिलावल का एक प्रकार है
  2. आरोह-अवरोह दोनों में शुद्ध नि प्रयोग करते हैं.
  3. कोमल नि केवल अवरोह में इस प्रकार प्रयोग किया जाता है - सां नि ध प, ध नि ध प
  4. राग की चलन उत्तरांग में अधिक होती है.
  5. अवरोह में ग स्वर वक्र प्रयोग होता है, जैसे - म ग म रे
इस राग पर आधारित कुछ बॉलिवुड गाने
१. भोर आई गया अन्धियारा - बावर्ची

२. सारे के सारे ग म को लेकर गाते चले - परिचय



राग भीमपलासी का परिचय

राग भीमपलासी का परिचय
जब काफी के मेल में, आरोहन रेध त्याग |
तृतीय प्रहार दिन ग नि कोमल, मानत म सा संवाद ||

थाट - काफी                         जाति - औडव-सम्पूर्ण
वादी - म                              संवादी - सा
आरोह - नि सा  म, प, नि, सां
अवरोह - सां नि ध प, म प  म, ग रे सा
पकड़ - नि सा म, म प  म,  रे सा

न्यास के स्वर - सा,  म प
सम्प्रकृति राग - बागेश्री

विशेषतायें

  1. इसमें ग नि कोमल तथा अन्य स्वर शुद्ध प्रयोग किया जाता है.
  2. आरोह में रे ध वर्जित है.
  3. अवरोह में सातों स्वरों का प्रयोग होता है.
  4. इसमें सा म और म  की संगति बार-बार दिखाते हैं.
  5. नि के साथ सा के तथा  के साथ म का मींड दिखाने की परंपरा है.
  6. यह करुण प्रकृति का राग है. इसमें बड़ा ख्याल, छोटा ख्याल, तराना, ध्रुपद-धमार आदि सभी गाये बजाये जाते हैं.

इस राग पर आधारित कुछ बॉलिवुड गाने
१. दिल के टुकड़े टुकड़े कर के - दादा
२. दिल में तुझे बिठाके - फकीरा
३. ए री मैं तो प्रेम दिवानी 
४. ए ली रे ए ली क्या है ये पहेली - यादें
५. किस्मत से तुम हमको मिले हो - पुकार
६. नैनों में बदरा छाये - मेरा साया


राग वृन्दावनी सारंग का परिचय

राग वृन्दावनी सारंग का परिचय
वर्ज्य करे धैवत गंधार, गावत काफी अंग |
दो निषाद रे प संवाद, है वृन्दावनी सारंग ||

थाट - काफी                     जाति - औडव औडव
वादी - रे                           संवादी - प
आरोह - ऩि सा रे म प नि सां                                 
अवरोह - सां नि प म रे सा
पकड़ - रे म प नि प, म रे, ऩि सा
समय - मध्यान्ह काल

न्यास के स्वर - सा, रे, प
सम्प्रकृति राग - सूर मल्हार

मतभेद - स्वर की दृष्टि से यह राग खमाज थाट जन्य माना जा सकता है, किन्तु स्वरुप की दृष्टि से इसे काफी थाट का राग मानना सर्वथा उचित है.

विशेषता

  1. इसके अतिरिक्त सारंग के अन्य प्रकार हैं - शुद्ध सारंग, मियाँ की सारंग, बड़हंस की सारंग, सामंत सारंग
  2. इसके आरोह में शुद्ध और अवरोह में कोमल नि का प्रयोग किया जाता है.
  3. ऐसा कहा जाता है की इस राग की रचना वृन्दावन में प्रचलित एक लोकगीत पर आधारित है.
  4. इसमें बड़ा ख्याल, छोटा ख्याल और तराना आदि गाये जाते हैं.


थाट : परिभाषा

थाट स्वरों की एक विशेष रचना होती है जिसमे से राग की बुनियाद बनती है. थाट के सम्बन्ध में निम्नलिखित बाते ध्यान रखी जाति है -
१. थाट में हमेशा सातों स्वर होते हैं,
२. थाट में रंजकता होनी आवश्यक नहीं है
३. थाट के लक्षण बताने के लिए अवरोह की कोई आवश्यकता नहीं है.


Saturday, February 9, 2019

वर्ण : परिभाषा

गाने की प्रत्यक्ष क्रिया या स्वरों की विविध चलन को वर्ण कहते हैं. ये चार प्रकार के होते हैं। अभिनव राग मंजरी में कहा गया है, "गान क्रियोच्यते वर्ण:" अर्थात् गाने की क्रिया को वर्ण कहते हैं।

१. स्थाई वर्ण - जब कोई स्वर एक से अधिक बार उच्चारित किया जाता है तो उसे स्थायी वर्ण कहते हैं, जैसे - रे रे, ग ग ग, म म म आदि।
२. आरोही वर्ण - स्वरों के चढ़ते हुये क्रम को आरोही वर्ण कहते हैं जैसे- सा रे म ग प ध नी
३. अवरोही वर्ण - स्वरों के उतरते हुये क्रम को अवरोही वर्ण कहते हैं जैसे - नि ध प म ग रे सा

  • ४. संचारी वर्ण - उपर्युक्त तीनों वर्णों के मिश्रित रूप को संचारी वर्ण कहते हैं । इसमें कभी तो कोई स्वर ऊपर चढ़ता है तो कभी कोई स्वर बार-बार दोहराया जाता है। दूसरे शब्दों में संचारी वर्ण में कभी आरोही, कभी अवरोही और कभी स्थाई वर्ण दृष्टिगोचर होता है जैसे - सा सा रे ग म प प म ग रे सा।

विवादी : परिभाषा

जिस स्वर को राग में लगाने से राग का स्वरुप बिगड़ जाये, अर्थात  राग में न प्रयोग किए जाने वाले स्वरों को विवादी कहते हैं. इसे राग का शत्रु भी कहते हैं. प्रचार में यह वर्ज्य या वर्जित स्वर कहलाता है.
कभी-कभी राग की सुंदरता बढ़ाने के लिए विवादी स्वर का क्षणिक प्रयोग भी किया जाता है ऐसा करते समय बड़ी सावधानी की आवश्यकता होती है अन्यथा राग के बिगड़ने की संभावना रहती है।
१. विवादी स्वर का उपयोग उस समय करना चाहिए जबकि राग के रंजकता में वृद्धि हो। केवल प्रयोग के लिए प्रयोग न करना चाहिए अन्यथा राग हानि होगी। बिहारग में तीव्र म विवादी स्वर है विवादी स्वर के प्रयोग करने से राग हानि नहीं होती बल्कि उसके गलत प्रयोग करने से राग हानि अवश्य होती है।
२. विवादी स्वर का अल्प प्रयोग होना चाहिए। ऐसा न करने से विवादी अनुवादी हो जाएगा।
३. विवादी के प्रयोग से राग का मूल स्वरूप किसी भी अंश में नहीं बिगड़ना चाहिए।

अनुवादी : परिभाषा

वादी और संवादी को छोड़कर बाद की नियमित स्वरों को अनुवादी कहते हैं. इन्हें राग का सेवक कहते हैं.
 उदाहरण के लिए भैरवी राग में म-सा के अतिरिक्त जो क्रमशः वादी-संवादी हैं, राग के शेष स्वर अनुवादी कहलाते हैं। अनुवादि स्वरों को अनुचर या सेवक कहा गया है।
राग यमन में वादी ग, संवादी नी और शेष स्वर - सा रे तिव्र-म, प, ध स्वर अनुवादी हैं।
राग खमाज में ग-वादी, नी-संवादी और शेष स्वर - सा, रे, ग, प और ध अनुवादी हैं।


The notes in a raga that neither Vadi nor, Samvadi are called Anuvadi notes. They are often called companion notes.

आभोग : परिभाषा

गाने के चौथे पद को आभोग कहते हैं. इसका रूप अंतरे से कुछ भिन्न होता है.

संचारी : परिभाषा

गाने के तीसरे पद को संचारी कहते हैं. इस पद से स्थाई के ऊपर वाले भाग का विशेष बोध होता है.

अंतरा : परिभाषा

गाने के दुसरे पद को अंतरा कहते हैं. यह पद मध्य-सप्तक से आरम्भ होकर तार-सप्तक के मध्य तक जाता है.

स्थाई : परिभाषा

गाने के प्रथम पद को स्थाई कहते हैं. इसमें राग का स्पष्ट रूप प्रकट हो जाता है और तार-सप्तक के स्वरों का उपयोग कम होता है.

गमक : परिभाषा

स्वरस्य कम्पो गमक: श्रोतृचित्तसुखावह:।


सितार में गमक मिठास उत्पन्न करने के लिए एक उत्तम क्रिया है। मींड, जमजमा, मुर्की एवं गिटकिड़ी आदि सभी गमक के हीं प्रकार हैं। परन्तु जब किसी स्वर की श्रुतियों को उससे आगे-पीछे की श्रुतियों में इस प्रकार मिला दिया जाये की आगे-पीछे के स्वर सुनाई न देकर, जिस स्वर पर यह क्रिया कर रहे हैं, केवल वही स्वर सुनाई दे तो इस क्रिया को गमक कहते हैं. 

नीचे स्वर से हिलते हुये ऊंचे स्वर पर जाने से गमक होता है।  यह दो स्वरों से उत्पन्न होता है, और मीड़ के सहीरे बजाया जाता है। 
गमक ७ प्रकार के होते हैं -
स्फुरितं कम्पितं लीनं स्तिमितांदोलितावपि
आहतं त्रिकभिन्नं च सप्तैते गमक: स्मृता।।


गिटकिड़ी : परिभाषा

सितार वादन में मुर्की बजाते हुए जब अंत में मध्यमा अंगुली से जमजमा की भांति किसी स्वर पर प्रहार किया जाता है तो मिजराब के एक हीं ठोकर से चार स्वर की ध्वनि सुनाई देती है जैसे की 'रेसानिसा'

मुर्की : परिभाषा

सितार वादन में जब एक हीं मिजराब के ठोकर में बिना मींड के तीन खरे स्वर बजाये जाएँ तो इस क्रिया को मुर्की कहते है. जैसे 'रेसानी'. इस क्रिया में रे पर मिजराब से ठोकर देते समय तर्जनी सा और मध्यमा रे के परदे पर रहेगी. रे पर मिजराब लगते हीं मध्यमा को तुरंत तार पर से उठाने से 'रेसा' की ध्वनि उत्पन्न होगी, एवं तर्जनी तुरंत घसीट कर नि के परदे पर पहुँचाने से 'रेसानी' की ध्वनि सुने देगी. 

जमजमा : परिभाषा

सितार वादन में किसी भी स्वर पर तर्जनी द्वारा बाज के तार को दबाकर उससे अगले परदे पर मध्यमा अंगुली को जोर से मरने पर जिस स्वर पर मध्यमा पड़ेगी, उसी स्वर की हल्की ध्वनि उत्पन्न होगी. इसे बजाने में दुसरे स्वर पर मिजराब द्वारा ठोकर नहीं दी जाएगी बल्कि केवल मध्यमा ऊँगली से दुसरे स्वर के परदे पर प्रहार की जाएगी. जब इस क्रिया को एक या अधिक बार किया जाता है तो इसे जमजमा कहते हैं.

कृन्तन : परिभाषा

इसकी यन्त्र संगीत में प्रयोग होता है। यह दो, तीन, चार स्वर से उत्पन्न होता है। यह एक स्वर का सम्बन्ध दूसरे स्वर से बनाये रखता है। ऊंचे स्वर से नीचे स्वर पर आने से दो आवाज होती है, उसे कृन्तन कहते हैं।  सितार वादन में मिजराब के एक हीं ठोकर में दो-तीन अथवा चार स्वरों को बिना मींड के केवल अँगुलियों के सहायता से निकलने की क्रिया को कृन्तन कहते हैं. कृन्तन में स्वरों की संख्या चार से अधिक भी हो सकती है.

विलोम मींड : परिभाषा

यदि सा के परदे पर पूर्व में हीं बिना तार को ठोकर दिए इतना खिंच जाये की आघात होने पर रे का स्वर सुने परे और फिर खींचे हुए तार को धीरे-धीरे ढीला करते हुए वापस सा के परदे पर आ जाने से सा का स्वर सुने पड़ने लगे तो ऐसे अवरोही क्रम में रे से सा की ध्वनि उत्पन्न हो तो इसे विलोम मींड कहते हैं. इस प्रकार की मींड में तार खीचने के बाद मिजराब से ठोकर दी जाति है.

अनुलोम मींड : परिभाषा

यदि सा पर मिजराब लगाकर दूसरी ऊँगली को रे पर न ले जाकर उसी सा के परदे पर हीं तार को इतना खींची जाय की रे का स्वर सुने देने लगे इस प्रकार आरोही के लिए खिंची गयी मींड को अनुलोम मींड कहते हैं. इस क्रिया में सा से रे की ध्वनि पहुंचने में ध्वनि कहीं भी खंडित नहीं होती है. 

मींड : परिभाषा

सितार में ही नहीं बल्कि समस्त भारतीय संगीत में मींड एक महत्वपूर्ण क्रिया है. संगीत में मिठास उत्पन्न करने वाली इस जैसी कोई अन्य क्रिया नहीं है. जब सितारवादक एम् ऊँगली से सा पर रखकर मिजराब लगते हैं और दूसरी ऊँगली से रे बजाते हैं अर्थात दोनों स्वरों पर ठोकर देकर बजाते हैं तो इसे खड़ा स्वर बजाना कहते हैं. किन्तु यदि एक स्वर पर मिजराब द्वारा ठोकर देने के बाद दुसरे स्वर की ध्वनि निकाली जाये तो इसे मींड कहते हैं.

Wednesday, February 6, 2019

राग यमन विशेष

Raga yaman - by NCERT Official


Raga yaman and Bollywood songs


Raga yaman - Alap on Sitar

Friday, January 25, 2019

तन्त्र वाद्य - चतुर्थ वर्ष (सीनियर डिप्लोमा)

चतुर्थ वर्ष (सीनियर डिप्लोमा)


क्रियात्मक 
  1. पिछले वर्षों के पाठ्यक्रमों का विशेष अभ्यास. स्वर-ज्ञान, लय-ज्ञान और राग-ज्ञान में निपुणता.
  2. वाद्य मिलाने का पूर्ण अभ्यास.
  3. अंकों या स्वरों के सहारे ताली देकर विभिन्न लयों का प्रदर्शन जैसे-दुगुन (१ मात्रा में २ मात्रा बोलना), तिगुन (१ में ३), चौगुन (१ में ४), आड़ (२ में ३), आड़ का उल्टा (३ में २), पौनगुन (४ में ३), सवागुन (४ में ५)
  4. गिटकिरी, मुर्की, खटका, कण, कृन्तन, जमजमा, लाग-डाट, घसीट आदि बजने का अभ्यास. कुछ कठिन मींड जैसे = जमजमा की मींड, मुर्की की मींड, गिटकिरी की मींड, सूत की मींड आदि निकालना.
  5. सुन्दर आलाप, जोड़ और झाले का विशेष अभ्यास.
  6. केदार, पटदीप, जैजैवंती,पुरिया, मारवा, कामोद, दरबारी-कान्हड़ा,, अड़ाना तथा देशकार रागों का पूर्ण-ज्ञान और प्रत्येक में एक-एक राजखानी गत या छोटा ख्याल सुन्दर आलाप, कठिन तान, तोड़ों, और झाला सहित.
  7. केदार, तोड़ी, मुल्तानी, पुरिया और दरबारी कान्हड़ा रागों का पूर्ण आलाप-जोड़ तथा एक-एक मसितखानी गत या बड़ा ख्याल कठिन और सुन्दर तान तोड़ों सहित.
  8. टप्पा और ठुमरी के ठेकों का साधारण ज्ञान. जत और आड़ा-चारताल का पूर्ण ज्ञान और इनको विभिन्न लयों में ताल देकर बोलना.
  9. बजाकर रागों में समता-विभिन्नता दिखाना.
  10. छोटे-छोटे स्वर-समूहों द्वारा राग पहिचान.


शास्त्र

  1. राग-रागिनी पद्धति, तान के विभिन्न प्रकारों का विस्तृत वर्णन विवादी स्वर का प्रयोग, निबद्ध गान के प्राचीन प्रकार (प्रबंध-वास्तु आदि) धातु, अनिबाध गान, अध्वदर्शक स्वर.
  2. २२ श्रुतियों का स्वरों में विभाजन (आधुनिक और प्राचीन-मतों का तुलनात्मक अध्ययन), खींचे हुए तार की लम्बाई का नाद के ऊँचे-निचेपन से सम्बन्ध.
  3. छायालग और संकीर्ण राग, परमल प्रवेशक राग, रागों का समय-चक्र, कर्नाटकी और हिन्दुस्तानी सन्गिईत पद्धतियों के स्वरों की तुलना. राग का समय निश्चित करने में वादी-संवादी, पूर्वांग, उत्तरांग और अध्वदर्शक-स्वर का महत्व.
  4. उत्तर भारतीय सप्तक से ३२ थाटों की रचना. आधुनिक थाटों के प्राचीन नाम, अल्पत्व-बहुत्व, तिरोभाव तथा आविर्भाव.
  5. रागों का तुलनात्मक अध्ययन, राग का स्वर-विस्तार लिखने तथा राग पहिचान में निपुणता.
  6. विभिन्न तालों की दुगुन, तिगुन तथा चौगुन प्रारंभ करने का स्थान गणित द्वारा निकलने की विधि विभिन्न लायकारियों को ताल-लिपि में लिखने का अभ्यास जैसे-दुगुन (१ मात्रा में २ मात्रा बोलना), तिगुन (१ में ३), चौगुन (१ में ४), आड़ (२ में ३), आड़ का उल्टा (३ में २), पौनगुन (४ में ३), सवागुन (४ में ५)
  7. विष्णु दिगंबर और भातखंडे दोनों स्वर्लिपियों का तुलनात्मक अध्ययन. दोनों स्वर्लिपियों में आलाप, गत, तान, तोड़ा, झाला लिखने के अभ्यास.
  8. विभिन्न भारतीय वाद्यों (तत्, वितत्, घन और सुषिर) का विस्तृत वर्णन और उनका इतिहास. वाद्यों को बजने की विभिन्न बैठक तथा उनके गुण और दोष. वाद्य मिलाने के विभिन्न प्रकार. मसितखानी और रजाखानी गत बजाने के नियम. विभिन्न तन्द्रा वाद्यों (सितार, सरोद, इसराज, बेला, सारंगी, वीणा) की विशेषताएं.
  9. निम्नलिखित शब्दों की परिभाषाएं - लाग-डाट, पुकार, लड़गुथाव, छूट, तार-परन, कृन्तन.
  10. भरत, अहोबल, व्यंकटमखी तथा मानसिंह तोमर का जीवन परिचय तथा संगीत कार्य.

तन्त्र वाद्य - तृतीय वर्ष

तृतीय वर्ष (तन्त्र वाद्य)
क्रियात्मक परीक्षा १०० अंकों की तथा शास्त्र का एक प्रश्न-पत्र ५० अंकों का. पिछले वर्षों का सम्पूर्ण पाठ्यक्रम भी सम्मिलित है.

क्रियात्मक 


  1. प्रथम और द्वितीय वर्षों की पाठ्यक्रम की विशेष जानकारी और तैयारी.
  2. स्वर-ज्ञान में विशेष उन्नति.
  3. अन्य कठिन अलंकारों और तानों को विभिन्न लयकारियों (ठाह, दून, तिगुन, और चौगुन) में विभिन्न बोलों में और तीनों सप्तकों में पूर्ण अभ्यास. आड़-लय का केवल प्रारंभिक ज्ञान.
  4. वाद्य मिलाने का प्रारंभिक अभ्यास.
  5. मींड, सूत, घसीट, जमजमा, खटका, मुर्की, स्पर्श, स्वर आदि निकालने का आरंभिक अभ्यास. प्रथम और द्वितीय वर्ष के रागों के स्वर-विस्तार में इन सब चीजों का साधारण प्रयोग.
  6. बागेश्री, मालकोस, जौनपुरी, तथा पूर्वी, रागों का साधारण आलाप, जोड़, और एक-एक विलंबित गत मसितखानी अथवा बड़ा-ख्याल (ख्याल-अंग बजाने वालों के लिए) दून और चौगुन लयों में सुन्दर तान, तोड़ों, सहित. हाथ की सफाई और तैयारी पर विशेष ध्यान रखना चाहिए.
  7. पूर्वी, तोड़ी, मुल्तानी, दुर्गा, कलिंङ्गड़ा, तिलङ, पीलू, तिलक कामोद, और सोहिनी रागों का पूर्ण-ज्ञान, स्वर विस्तार (साधारण और मींड-सूत द्वारा) और प्रत्येक में एक-एक रजाखानी-गत अथवा छोटा-ख्याल सुन्दर तान, तोड़ों और झाला सहित.
  8. दीपचंदी, धमार, झुमरा तथा तिलवाड़ा तालों के ठेकों को ठाह, दुगुन, तिगुन और चौगुन लयों में बोलना.
  9. राग पहचान में निपुणता.


शास्त्र

  1. प्रथम और द्वितीय वर्षों के कुल पारिभाषिक शब्दों का विस्तृत ज्ञान, २२ श्रुतियों का सात शुद्ध स्वरों में विभाजन (आधुनिक मत), आन्दोलन की चौड़ाई और उसका नाद से छोटे-बड़ेपन से सम्बन्ध, थाट और राग के विशेष नियम. श्रुति और नाद में सूक्ष्म भेद. व्यंकटमखी के ७२ मेलों की गणितानुसार रचना और एक थाट से ४८४ रागों की उत्पत्ति. स्वर और समय के अनुसार रागों के तीन वर्ग (रे-ध कोमल वाले राग, रे-ध शुद्ध वाले राग, और ग-नि कोमल वाले राग), संधिप्रकाश राग, तानों के प्रकार.
  2. वाद्य सम्बन्धी पारिभाषिक शब्दों एवं विषयों का पूर्ण ज्ञान, तरब, जोड़, अनुलोम तथा विलोम, मींड, गमक, सूत, घसीट, मुर्की, गिटकिरी, खटका, तंत्र, तन्त्रकारों के गुण-दोष, कस्बी तथा अताई.
  3. रागों का पूर्ण परिचय एवं तुलनात्मक अध्ययन स्वर-विस्तार सहित.
  4. आलाप, गत, तान तोड़ा, झाला आदि को स्वरलिपि में लिखने का पूर्ण अभ्यास.
  5. इस वर्ष तथा पिछले वर्षों के तालों का पूर्ण ज्ञान. उनके ठेकों को दुगुन, तिगुन और चौगुन लयों में ताल-लिपि में लिखना. किसी ताल अथवा गत या गीत को दुगुन आदि आरंभ करने के स्थान को भिन्न-भिन्न स्थानों द्वारा निकालने की रीति.
  6. कठिन स्वर-समूहों द्वारा राग पहिचान.
  7. भातखंडे तथा विष्णु दिगंबर स्वर-लिपि पद्धतियों का पूर्ण-ज्ञान.
  8. शारङदेव तथा स्वामी हरिदास को संक्षिप्त जीवनियां तथा उनके संगीत कार्यों का परिचय.


Friday, January 4, 2019

Ghunghroo for indian classical dance


अलंकार : परिभाषा

स्वरों की नियमानुसार  चलन को अलंकार कहते हैं. अलंकार में कई कड़ियाँ होती हैं जो आपस में एक दूसरे से जुड़ी होती है. प्रत्येक अलंकार में मध्य सा से तार सा तक आरोही वर्ण और तार सा के मध्य सा तक अवरोही वर्ण हुआ करता है. 'संगीत दर्पण' के अनुसार इसकी परिभाषा इस प्रकार दी गई है:
'विशिष्ट वर्ण सन्दभम् लंकार प्रचक्षते'
अर्थात नियमित वर्ण-समूह को अलंकार कहते हैं. अलंकार का अवरोह, आरोह का ठीक उल्टा होता है, जैसे:-
आरोह - सारेग, रेगम, गमप, पधनी, धनिसा.
अवरोह - सानिध, निधप, धपम, पमग, मगरे, गरेसा.
इसी प्रकार अनेक अलंकारों की रचना हो सकती है. अलंकार को पलटा भी कहते हैं. 

Thursday, December 27, 2018

कत्थक नृत्य सिलेबस भाग १

Katthak dance Syllabus


by Shri Harish Chandra Srivastava

It is also useful for the Kathak dance Students of High School, Intermediate and B.A. Examinations of different Boards and Universities of India. Description: This text book of Kathak dance has been written according to the syllabus of Junior and Senior Diploma courses of Prayag Sangit Samiti, Allahabad, Praveshika and Madhyama courses of A.B. Gandharva Mahavidyalaya Mandal, Bombay, Prathama and Madhyama courses of Bhatkhande Sangit Vidyapeeth, Lucknow and Indira Kala Sangit Vishwa-Vidyalaya, Khairagarh and Prarambhik and Nritya Bhushan Courses of Pracheen Kala Kendra, Chandigarh.


Wednesday, December 26, 2018

राग भैरवी का परिचय

राग भैरवी का परिचय
''''रे ग ध नि कोमल राखत, मानत मध्यम वादी।
प्रात: समय जाति संपूर्ण, सोहत सा संवादी॥''''
कोमल स्वर - रिषभ, गंधार, धैवत और निषाद।
शुद्ध स्वर - षडज, मध्यमा, पंचम।
जाति - सम्पूर्ण-सम्पूर्ण
थाट - भैरवी
वादी - मध्यमा
संवादी - षडज
आरोह- सा रे॒ ग॒ म प ध॒ नि॒ सां।
अवरोह- सां नि॒ ध॒ प म ग॒ रे॒ सा।
पकड़- म, ग॒ रे॒ ग॒, सा रे॒ सा, ध़॒ नि़॒ सा।
विशेषता -
विशेष - यह भैरवी थाट का आश्रय राग है। हालांकि इस राग का गाने का समय प्रातःकाल है पर इस राग को गाकर महफिल समाप्त करने की परंपरा प्रचार में है। आजकल इस राग में बारह स्वरों का स्वतंत्र रूप से प्रयोग करने का चलन बढ़ गया है जिसमें कलाकार कई रागों के अंगों का प्रदर्शन करते हैं। यह राग भाव-अभिव्यक्ति के लिए बहुत अनुकूल तथा प्रभावकारी है। इसके पूर्वांग में करुण तथा शोक रस की अनुभूति होती है। और जैसे ही पूर्वार्ध और उत्तरार्ध का मिलाप होता है तो इस राग की वृत्ति उल्हसित हो जाती है।
इस राग के इतने लचीले, भावपूर्ण तथा रसग्राही स्वर हैं की श्रोतागण मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। इस राग का विस्तार मध्य तथा तार सप्तक में किया जाता है।
इस राग में जब शुद्ध रिषभ का प्रयोग किया जाता है तो इसे सिंधु-भैरवी कहा जाता है।
इस राग की प्रकृति चंचल है अतः इसमें ख्याल नही गाये जाते। इसमें भक्ति तथा श्रृंगार रस की अनुभूति भरपूर होती है अतः इसमें भजन, ठुमरी, टप्पा, ग़ज़ल, आदि प्रकार गाये जाते हैं।
राग भैरवी आधारित फिल्मी गाने -
गूंज उठी शहनाई - दिल का खिलौना हाय टूट गया
सीमा - सुनो छोटी सी गुड़िया की लंबी कहानी
बैजू बावरा - तू गंगा की मौज मैं जमुना की धारा
सत्यम शिवम सुन्दरम् - सत्यम शिवम सुन्दरम,
दाग - ऐ मेरे दिल कहीं और चल
आवारा - आवारा हूं या गर्दिश में मैं आसमान का तारा
           - घर आया मेरा परदेशी
रोटी कपड़ा और मकान - महंगाई मार गई
दो कलियां - बच्चे मन के सच्चे
बरसात - बरसात में हम से मिले तुम सजन,
           - छोड़ गये बालम
दो बदन - भरी दूनिया में आखिर दिल
सत्यम शिवम सुन्दरम - भोर भये पनघट पे
संगम - बोल राधा बोल संगम, दोस्त दोस्त ना रहा
जंगली - चाहे कोई मुझे जंगली कहे
छलिया - छलिया मेरा नाम
अमर प्रेम - चिंगारी कोई भड़के तो
सुर संगम - धन्य भाग सेवा का अवसर पाया
गैम्बलर - दिल आज शायर है
दिल अपना और प्रित पराई - दिल अपना और प्रित पराई
गंगा जमुना - दो हंसों का जोड़ा
तीसरी कसम - दुनिया बनाने वाले
कुदरत - हमें तुमसे प्यार कितना
जिस देश में गंगा बहती है - होठों पे सच्चाई रहती है
              - मेरा नाम राजू घराना
अमर - इन्साफ का मन्दिर है ये भगवान का घर है
भरोसा - इस भरी दुनिया में कोई
माया - जा रे, जारे उर जा रे पंछी
शाह जहां - जब दिल हीं टूट गया
मेरा नाम जोकर - जीना यहां मरना यहां
                      - कहता है जोकर सारा जमाना
सहेली - जिस दिल में बसा था प्यार तेरा
झनक झनक पायल बाजे - जो तुम तोड़ो पिया
संत ज्ञानेश्वर - ज्योत से ज्योत जगाते चलो
ऐतबार - किसी नज़र को तेरा इंतजार
दिल हीं तो है - लागा चुनरी में दाग
आलाप - माता सरस्वती शारदा
बसन्त बहार - मैं पिया तेरी तु माने या ना माने
उपकार - मेरे देश की धरती सोना उगले
श्री ४20 - मेरा जूता है जापानी
            - प्यार हुआ इकरार हुआ है
            - रमैया वस्तावैया
द लिजेन्ड ऑफ भगत सिंह - मेरा रंग दे बसन्ती चोला
कसमे वादे - मिले जो कड़ी कड़ी
पं० भीमसेन जोशी - मिले सुर मेरा तुम्हारा
किनारा - मीठे बोल बोल
जवाब - पूरब न जईयो
दिल भी तेरा हम भी तेरे - मुझको इस रात की तन्हाई
मेरी सूरत तेरी आँखें - नाचे मन मोरा मगन तीद दा
दूज का चांद - फूल गेंदवा न मारो
आह - राजा की आयेगी बारात
अनाड़ी - सबकुछ सीखा हमने न सीखी होशियारी
           - तेरा जाना
साहिब बीबी और गुलाम - साक़िया आज मुझे नीन्द नहीं
गुलामी - सुनाई देती है जिसकी धड़कन
शबनम - तेरी निगाहों पे मर
धूल का फूल - तू हिन्दू बनेगा न मुसलमान बनेगा
मैं चुप रहूंगी - तुम्हीं हो माता पिता तुम्हीं हो
आई मिलन की बेला - तुम्हें और क्या दूं मैं दिल के सिवा
ग़ुलाम अली - दिल ये पागल दिल मेरा क्युं बुझ गया
हरियाली और रास्ता - ये हरियाली और ये रास्ता

Monday, October 22, 2018

थाट और उनके प्रकार (That and their types)

थाट 
मेलः स्वरसमूहः स्याद्रागव्यंजनशक्तिमान  
अर्थात मेल में स्वरों की ऐसी रचना है, जिससे राग बन सके।  इस प्रकार के कुल ७२ हैं परन्तु वे सब हमारे काम के नहीं हैं। 
हिंदुस्तानी संगीत पद्धति में थाट माने गए हैं।

थाट के प्रकार 
वैसे तो थाट की संख्या ७२ है किन्तु मुख्यतः निम्नलिखित १० थाट हैं जो आज-कल व्यवहार में हैं:-

Sl.                    That
1 BILAWAL S R G M P D N S
2 KHAMAJ S R G M P D n S
3 BHAIRAV S r G M P d N S
4 KAFI S R g M P D n S
5 ASAWARI S R g M P d n S
6 BHAIRAVI S r g M P d n S
7 KALYAN S R G m P D N S
8 MARWA S r G m P D N S
9 PURVI S r G m P d N S
10 TODI S r g m P d N S

कोमल स्वर - r g d n
तीव्र स्वर - m
शुद्ध स्वर - S R G M P D N


Trick to remember ten thats
B3 - Bilawal Bhairav Bhairavi
K3 - Kalyan Kafi Khamaj
AMPT - Asawari Marwa Purvi Todi

Wednesday, May 23, 2018

Raga Bageshree


The program was at Swamijee's Paitric Abas, Vivekananda Road on 25.12.2017

Sri Dipankar Chaudhuri : Sarod
Sri Dishari Chakraborty : Santoor
Sri Nishaant Singh : Pakhwaj

By Sri Deepankar Choudhury on Sarod

Wednesday, May 16, 2018

नाद की विशेषताये

नाद की विशेषताएं

नाद की मुख्य तीन विशेषताएं हैं - 

१. नाद की ऊँचाई-निचाई
२. नाद का छोटा-बड़ापन
३. नाद की जाति अथवा गुण

१. नाद की ऊँचाई-निचाई

गाते बजाते समय हम यह अनुभव करते हैं कि बारहों स्वर एक दुसरे से ऊँचे नीचे हैं. स्वर अथवा नाद की ऊंचाई-निचाई आन्दोलन-संख्या पर आधारित होती है. अधिक आन्दोलन-संख्या वाला स्वर ऊँचा और इसके विपरीत कम आन्दोलन वाला स्वर नीचा होता है. गाते-बजाते समय ऐसा सहज हीं अनुभव की जा सकती है कि सा से ऊँचा ग होता है, जिसका अर्थ है कि ग की आन्दोलन सा से अधिक होगी. इसी प्रकार ग से नीचा रे होता है. अतः रे की आन्दोलन ग से कम होगी.

२. नाद का छोटा-बड़ापन

क्रियात्मक संगीत में यह स्वतः हीं अनुभव किया जा सकता है कि धीरे से उच्चारण करने पर स्वर थोड़ी दूर तक और जोर से की गई उच्चारण अधिक दुरी तक सुनाई पड़ता है. इसे संगीत में नाद का छोटा-बड़ापन कहते हैं. छोटा नाद कम दुरी तक और धीमा सुनाई पड़ता है और बड़ा नाद अधिक दूरी तक स्पष्ट सुनाई पड़ता है. तानपूरे के तार को धीरे से आघात करने में तार के आन्दोलन की चौड़ाई कम होगी अर्थात तार कम दूरी तक ऊपर-निचे कम्पन्न करेगा और फलस्वरूप छोटा नाद उत्पन्न होगा. इसके विपरीत तार को जोर से छेड़ने से तार के आन्दोलन की चौड़ाई अधिक होगी और बड़ा नाद उत्पन्न होगा. इस प्रकार स्पस्ट है की नाद का छोटा-बड़ापन आन्दोलन की चौड़ाई पर निर्भर है.

३. नाद की जाति अथवा गुण


प्रत्येक वाद्य का स्वर एक दूसरे से अलग होता है. जैसे कि सितार का स्वर बेला से और बेला का स्वर हारमोनियम से और हारमोनियम का स्वर सरोद से भिन्न होता है. इस लिए दूर से आती हुई संगीत ध्वनि को हम पहचान लेते हैं कि ध्वनि किस वाद्य की है. विभिन्न वाद्यों के स्वरों में भिन्नता होते का कारण यह है कि प्रत्येक वाद्य के सहायक नादों की संख्या, उनका क्रम और प्राबल्य एक दूसरे से भिन्न होता है. इसी को नाद की जाति अथवा गुण कहते हैं. ऐसा मानना है कि कोई भी नाद अकेला उताण नहीं होता, उसके साथ कुछ अन्य नाद भी उत्पन्न हुआ करते हैं, जिन्हें केवल अनुभवी कान हीं सुन सकते हैं. ऐसे स्वतः उत्पन्न होने वाले स्वरों को सहायक नाद कहते हैं. सहायक नादों की संख्या, क्रम और प्राबल्य पर नाद की जाति आधारित होती है.

Tuesday, May 8, 2018

Raag parichay

Raag Parichay from Part 1 to Part 4

Raag Parichaya by Pdt Harish Chandra Shrivastava set of 4 books part I to IV Indian Music Theory Book, Best book for Theory study in Indian Music in Hindi

Product details

Paperback
Language: Hindi
ASIN: B00LEANUUC
Package Dimensions: 17.8 x 12.7 x 5.3 cm


by Shri Harish Chandra Srivastava
Raag Parichay from Part 1
by Shri Harish Chandra Srivastava

Sangeet Visharad (Hindi)

Sangeet visharad


by Vasant

Famous book "Sangeet Visharad", Indian Music Theory Book, Best book for Indian Music in Hindi covers all the topics of Indian Music.

Product details

Hardcover: 785 pages
Publisher: Sangeet Karyalay; 28th edition (2013)
Language: Hindi
ISBN-10: 8185057001
ISBN-13: 978-8185057002
Package Dimensions: 23.2 x 16.7 x 2.8 cm


Sixth Year - Sangeet Prabhakar - Vocal


प्रयाग संगीत समिति, इलाहबाद का पाठ्यक्रम.

षष्ठम वर्ष/संगीत प्रभाकर (Sixth Year/Sangeet Prabhakar)

क्रियात्मक परीक्षा २०० अंकों की और दो प्रश्न-पत्र ५०-५० अंकों के. पिछले वर्षों का पाठ्यक्रम भी सम्मिलित है.

क्रियात्मक (Practical)

१.      राग पहचान में निपुणता और अल्पत्व-बहुत्व, तिरोभाव-आविर्भाव और समता-विभिन्नता दिखाने के लिए पूर्व वर्षों के सभी रागों का प्रयोग हो सकता है, इसलिए सभी का विशेष विस्तृत अध्ययन आवश्यक है.
२.      गाने में विशेष तैयारी, आलाप-तान में सफाई महफिल के गाने में निपुणता.
३.      ठप्पा, ठुमरी, तिरवट और चतुरंग गीतों का परिचय, इनमे से किन्हीं दो गीतों को जानना आवश्यक है.
४.      रामकली, मियाँ मल्हार, परज, बसंती, राग श्री, पूरिया धनाश्री, ललित, शुद्ध कल्याण, देशी और मालगुन्जी रागों में एक-एक बड़ा-ख्याल और छोटा ख्याल पूर्ण तैयारी के साथ. किन्हीं दो रागों में एक-एक धमार, एक-एक ध्रुपद और एक-एक तराना जानना आवश्यक है. प्रथम वर्ष से षष्ठम वर्ष एस के रागों में से किसी एक चतुरंग.
५.      काफी, पीलू, पहाड़ी, झिंझोटी, भैरवी तथा खमाज इनमे से किन्हीं दो रागों में दो ठुमरी.
६.      लक्ष्मी ताल, ब्रह्म ताल तथा रूद्र ताल – इनका पूर्ण परिचय तथा इनको पिछली लयकारियों में हाथ से ताली देकर लिखने का अभ्यास.

प्रथम प्रश्नपत्र - शास्त्र (First Paper - Theory)

१.      प्रथम से छठे वर्ष के सभी रागों का विस्तृत, तुलनात्मक और सूक्ष्म परिचय. उनके आलाप-तान आदि स्वरलिपि में लिखने का पूर्ण अभ्यास. समप्रकृति रागों में समता-विभिन्नता दिखाना.
२.      विभिन्न राओं में अल्पत्व-बहुत्व, अन्य रागों की छाया आदि दिखाते हुए आलाप-तान स्वरलिपि में लिखना.
३.      कठिन लिखित स्वर समूहों द्वारा राग पहचानना.
४.      दिए हुए रागों में नए सरगम बनाना. दी हुई कविता को राग में ताल-बद्ध करने का ज्ञान.
५.      गीतों की स्वरलिपि लिखना, धमार, ध्रुपद को दुगुन, तिगुन, चौगुन, और आड़ आदि लयकारियों में लिखना.
६.      ताल के ठेके को विभिन्न लयकारियों में लिखना.
७.      कुछ लेख रेज – जीवन में संगीत की आवश्यकता, महफ़िल की गायकी, शास्त्रीय संगीत का जनता पर प्रभाव, रेडियो और सिनेमा-संगीत, पृष्ठ संगीत (background music), हिन्दुस्तानी संगीत और वृंदवादन, हिन्दुस्तानी संगीत की विशेषताये, स्वर का लगाव, संगीत और स्वरलिपि इत्यादि.
८.      हस्सू-हद्दू खां, फैयाज़ खां, अब्दुल करीम खां, बड़े गुलाम अली और ओंकारनाथ ठाकुर का जीवन परिचय और कार्य.

द्वितीय प्रश्नपत्र शुद्ध शास्त्र (Second Paper - Theory)

१.      पिछले सभी वर्षों के शास्त्र सम्बंधित विषयों का सूक्ष्म तथा विस्तृत अध्ययन.
२.      मध्य कालीन तथा आधुनिक संगीतज्ञों के स्वर स्थानों की आन्दोलन-संख्याओं की सहायता तथा तार की लम्बाई की सहायता से तुलना. पाश्चात्य स्वर-सप्तक की रचना, सरल गुणान्तर और शुभ स्वर संवाद के नियम, पाश्चात्य स्वरों की आन्दोलन-संख्या, हिन्दुस्तानी स्वरों में स्वर संवाद, कर्नाटकी ताल पद्धति और हिन्दुस्तानी ताल पद्धति का तुलनात्मक अध्ययन. संगीत का संक्षिप्त क्रमिक इतिहास, ग्राम, मूर्छना (अर्थ में क्रमिक परिवर्तन), मूर्छना और आधुनिक थाट, कलावंत, पंडित, नायक, वाग्गेयकार, बानी (खंडार, डागुर, नौहार, गोबरहार), गीति, गीति के प्रकार, गमक के विविध प्रकार, हिन्दुस्तानी वाद्यों के विविध प्रकार. (तत, अवनद्ध, घन, सुषरी)
३.      निम्नलिखित विषयों का ज्ञान – तानपुरे से उत्पन्न होने वाले सहायक नाद, पाश्चात्य सच्चा स्वर-सप्तक (Diatonic Scale) को (Equally Tempered Scale) में परिवर्तित होने का कारन व विवरण, मेजर, माईनर और सेमिटोन, पाश्चात्य आधुनिक स्वरों के गुण-दोष, हारमोनियम पर एक आलोचनात्मक दृष्टि, तानपुरे से निकलने वाले स्वरों के साथ हमारे आधुनिक स्वर-स्थानों का मिलान. प्राचीन, मध्यकालीन तथा आधुनिक राग-वर्गीकरण, उनका महत्त्व, और उनके विभिन्न प्रकारों को पारस्परिक तुलना, संगीत-कला और शास्त्र का पारस्परिक सम्बन्ध. भरत की श्रुतियाँ सामान थीं अथवा भिन्न थीं-इस पर विभिन्न विद्वानों के विचार और तर्क. सारणा चतुष्टई का अध्ययन, उत्तर भारतीय संगीत को ‘संगीत पारिजात’ की दें, हिन्दुस्तानी और कर्नाटकी संगीत-पद्धतियों की तुलना, उनके स्वर, ताल और रागों का मिलन करते हुए पाश्चात्य स्वरलिपि पद्धति का साधारण ज्ञान, संगीत के घरानों का संक्षिप्त ज्ञान, रत्नाकर के दस विधि राग वर्गीकरण-भाषा, विभाषा इत्यादि.
४.      भातखंडे और विष्णु दिगंबर स्वर-लिपियों का तुलनात्मक अध्ययन और उनकी त्रुटी और उन्नति के सुझाव.
५.      लेख-भावी संगीत के समुचित निर्माण के लिए सुझाव, हिन्दुस्तानी संगीत पद्धति के मुख्या सिद्धांत. प्राचीन और आधुनिक प्रसिद्द संगीतज्ञों का परिचय तथा उनकी शैली. संगीत का मानव जीवन पर प्रभाव, संगीत और चित्त (Mind and Music) स्कूलों द्वारा संगीत शिक्षा की त्रुटियों और उन्नति के सुझाव, संगीत और स्वर साधन.


Monday, May 7, 2018

Fifth year - Vocal


प्रयाग संगीत समिति, इलाहबाद का पाठ्यक्रम.


पंचम वर्ष (Fifth Year)

क्रियात्मक परीक्षा १०० अंकों की और एक प्रश्न-पत्र ५० अंकों का, पिछले वर्षों का पाठ्यक्रम भी सम्मिलित है.

क्रियात्मक (PRACTICAL)

१.      कुछ कठिन लयकारियों को ताली देकर दिखाना. दो मात्रा में ३ मात्रा बोलना और ३ में ४ मात्रा बोलना      इत्यादि.
२.      नोम-तोम के आलाप का विशेष अभ्यास
३.      पुरिया, गौड़ मल्हार, छायानट, श्री, हिंडोल, गौड़ सारंग, विभास, दरबारी कान्हड़ा, तोड़ी, अड़ाना इन रागों में १-१ विलंबित और १-१ द्रुत ख्याल पूर्णतया सुंदर गायकी के साथ. किन्हीं दो रागों में एक-एक धमार और किन्हीं दो में से एक-एक ध्रुपद जिनमे दुगुन, तिगुन चौगुन और आड़ करना आवश्यक है.
४.      रागों का सुक्ष्म अध्ययन. रागों का तिरोभाव-आविर्भाव का क्रियात्मक प्रयोग.
५.      पंचम सवारी, गजझम्पा, अद्धा, मत्त और  पंजाबी तालों का पूर्ण ज्ञान और इन्हें ठाह, दुगुन तथा चौगुन लयकारियों में ताली देकर बोलना.
६.      तीनताल, झपताल, चारताल, एकताल, कहरवा, तथा दादरा तालों के तबले पर बजने का साधारण अभ्यास.

शास्त्र (THEORY)

१.      पिछले पाठ्यक्रमों का पूर्ण विस्तृत अध्ययन
२.      अनिबद्ध गान के प्राचीन प्रकार – रागालाप, रुपकालाप, आलाप्तिगान, स्वस्थान-नियम, विदारी, राग लक्षण, जाति-गायन और विशेषताएं, सन्यास-विन्यास, गायकी, नायकी, गान्धर्व गीत (देशी-मार्गी) पाठ्यक्रम के रागों में तिरोभाव-आविर्भाव और अल्पत्वा-बहुत्व दिखाना.
३.      श्रुति-स्वर विभाजन के सम्बन्ध में सम्पूर्ण इतिहास को तीन मुख्या कालों में विभाजन (प्राचीन, मध्य, आधुनिक), इन तीनों कालों के ग्रंथकारों के ग्रन्थ और उनमें वर्णित मतों में समय और भेद, षडज पंचम भाव और आन्दोलन संख्या तथा तार की लम्बाई का सम्बन्ध, किसी स्वर की आन्दोलन-संख्या तथा तार की लम्बाई निकालना जबकि षडज की दोनों वस्तुएं प्राप्त हों. इसी, प्रकार तार की लम्बाई दी हुई हो तो आन्दोलन-संख्या निकालना, मध्यकालीन पंडितों और आधुनिक पंडितों के शुद्ध और विकृत स्वरों के स्थानों की तुलना उनके तार की लम्बाईयों की सहायता से करना.
४.      विभिन्न रागों के सरल तालों के सरगम मन से बनाना
५.      इस वर्ष के रागों का विस्तृत अध्ययन तथा उनसे मिलते-जुलते रागों का मिलान, रागों में अल्पत्व-बहुत्व, तिरोभाव-आविर्भाव.
६.      इस वर्ष के तालों का पूर्ण परिचय और उनके ठेकों को विभिन्न लयकारियों में ताल-लिपि में लिखना. गणित द्वारा किसी गीत या ताल की दुगुन, तिगुन आदि प्रारंभ करने का स्थान निश्चित करना.
७.      गीत और उनकी तिगुन और चौगुन स्वरलिपि में लिखना.
८.      निबंध के विषय – राग और रस, संगीत और ललित कलाएं, संगीत और कल्पना, यवन संस्कृति का हिन्दुस्तानी संगीत पर प्रभाव, संगीत व उसका भविष्य, संगीत में वाद्यों का स्थान, लोक संगीत आदि.
९.      गीतों व तालों को किसी भी स्वरलिपि में लिखने का अभ्यास.
१०.  श्रीनिवास, रामामत्य, ह्रदय नारायण देव, मोहम्मद रज़ा, सदारंग-अदारंग का जीवन परिचाल तथा उनका संगीत-कार्य.

Senior Diploma - Vocal


प्रयाग संगीत समिति, इलाहबाद का पाठ्यक्रम.

चतुर्थ वर्ष (Senior Diploma)

क्रियात्मक परीक्षा १०० अंकों की और एक प्रश्न-पत्र ५० अंकों का, पिछले वर्षों का पाठ्यक्रम भी सम्मिलित है.


क्रियात्मक (Practical)

१.      स्वर ज्ञान का विशेष अभ्यास, कठिन स्वर-समूहों की पहचान.
२.      तानपुरा और तबला मिलाने की विशेष क्षमता.
३.      अंकों या स्वरों के सहारे ताली देकर विभिन्न लयों का प्रदर्शन – द्विगुण (एक मात्रा में दो मात्रा), तिगुन (१ में ३) चौगुन, आड़ (२ में ३) और आड़ की उलटी (३ में २ मात्रा बोलना), (४ में ३) तथा ४ में ५ मात्राओं का प्रदर्शन.
४.      कठिन और सुन्दर आलाप और तानों का अभ्यास.
५.      देशकार, शंकरा, जयजयवंती, कामोद, मारवा, मुल्तानी, सोहनी, बहार, पूर्वी. इन रागों में १-१ विलंबित और द्रुत ख्याल, आलाप, तान, बोलतान सहित.
६.      उक्त रागों में से किन्हीं दो में १-१ ध्रुपद तथा किन्हीं दो में १-१ धमार केवल ठाह, द्विगुण, तिगुन, और चौगुन सहित तथा एक तराना.
७.      ख्याल की गायकी में विशेष प्रवीणता.
८.      टप्पा और ठुमरी के ठेकों का साधारण ज्ञान. जत और आड़ा चारताल को पूर्ण रूप से बोलने का अभ्यास.
९.      स्वर-समूहों द्वारा राग पहचान.
१०.  गाकर रागों में समता-विभिन्नता दिखाना.


शास्त्र (Theory)

१.      गीत के प्रकार – टप्पा, ठुमरी, तराना, तिरवट, चतुरंग, भजन, गीत, गजल आदि गीत के प्रकारों का विस्तृत वर्णन, राग-रागिनी पद्धति आधुनिक आलाप-गायन की विधि, तान के विविध प्रकारों का वर्णन, विवादी स्वर का प्रयोग, निबद्ध गान के प्राचीन प्रकार (प्रबंध, वास्तु आदि) धातु, अनिबद्ध गान.
२.      बाईस श्रुतियों का स्वरों में विभाजन (आधुनिक और प्राचीन मत), खींचे हुए तार की लम्बाई का नाद के ऊँचे-निचेपन से सम्बन्ध.
३.      छायालग और संकीर्ण राग, परमेल प्रवेशक राग, रागों का समय-चक्र, दक्षिणी और उत्तरी हिन्दुस्तानी पद्धतियों के स्वर की तुलना, रागों का समय-चक्र निश्चित करने में अध्वदर्शक स्वर, वादी-संवादी और पूर्वांग-उत्तरांग का महत्व
४.      उत्तर भारतीय सप्तक से ३२ थाटों की रचना, आधुनिक थाटों के प्राचीन नाम, तिरोभाव-आविर्भाव, अल्पत्व-बहुत्व.
५.      रागों का सूक्ष्म तुलनात्मक अध्ययन, राग-पहचान
६.      विष्णु दिगंबर और भातखंडे दोनों स्वर्लिपियों का तुलनात्मक अध्ययन. गीतों को दोनों पद्धति में लिखने का अभ्यास. धमार, ध्रुपद को दून तिगुन व चौगुन स्वरलिपि में लिखना.
७.      भरत, अहोबल, व्यंकटमखि तथा मानसिंह का जीवन-चरित्र और उनके संगीत कार्यों का विवरण.
८.      पाठ्यक्रम के सभी तालों की दुगुन, तिगुन, चौगुन प्रारंभ करने का स्थान गणित द्वारा निकालने की विधि. दुगुन, तिगुन तथा चौगुन के अतिरिक्त अन्य विभिन्न लयकारियों को ताल-लिपि में लिखने का अभ्यास

Thursday, May 3, 2018

खाली : परिभाषा

खाली -
ताल देते समय जहाँ विभाग की प्रथम मात्र पर ध्वनि न करके केवल हाथ हिलाकर इशारा कर देते हैं, उसे 'खाली' कहते हैं. अधिकतर खाली ताल के बीच की मात्र अथवा उसके आस पास हीं कहीं पड़ती है.

उदाहरनार्थ तीन ताल में ९वी मात्रा में हाथ को हवा में हिलाकर खाली दिखाया जाता है.

अन्य परिभाषाये देखें-
taali ताली 
sam सम
dhwani ध्वनि
naad नाद
vaadi-samvaadi वादी संवादी

ताली : परिभाषा

ताली -
सम के अलावा अन्य विभागों की पहली मात्रा पर जहाँ हथेली पर दुसरे हाथ की हथेली के आघात द्वारा ध्वनि उत्पन्न की जाती है, उसे ताली कहते हैं.
उदाहरनार्थ तीन ताल में १, ३, एवं ८ पर ताली दी जाती है.


अन्य परिभाषाये देखें-
taali ताली 
sam सम
dhwani ध्वनि
naad नाद
vaadi-samvaadi वादी संवादी

सम : परिभाषा

सम -
किसी भी ताल विभाग की प्रथम मात्रा पर जो ताली पड़ती  है, उसे 'सम' की संज्ञा देते हैं. गायन-वादन और नृत्य में सदा सम पर जोर देने की प्रथा है. यही वह स्थान है, जहाँ से प्रत्येक ताल का ठेका प्रारम्भ होता है.

उदाहरनार्थ तीन ताल में १ पर सम दिखाया जाता है.

अन्य परिभाषाये देखें-
taali ताली 
sam सम
dhwani ध्वनि
naad नाद
vaadi-samvaadi वादी संवादी

देशी संगीत : परिभाषा

प्राचीनकाल में संगीतज्ञों ने शाश्त्रीय संगीत को दो विभागों में बाँट दिया-
१.मार्गी संगीत
२. देशी संगीत या गान

२.देशी संगीत या गान  -
कालांतर में यह अनुभव किया गया कि ईश्वर-प्राप्ति के अतिरिक्त संगीत में मनोरंजन करने की सीमाहीन शक्ति है. तभी से मार्गी संगीत के अलावा संगीत का दूसरा रूप अर्थात देशी संगीत प्रचार में आया. देशी संगीत का उद्देश्य जन-मन रंजन है. इसमें लोक-रूचि और देश-काल के अनुसार कई परिवर्तन भी हुए हैं. और निरंतर होते रहेंगे. इसके नियम मार्गी संगीत की तरह कड़े नहीं है, और इसीलिए इसमें स्वतंत्रता भी अधिक है. मार्गी संगीत अब प्रचार में नहीं हैं.

संपूर्ण भारत में आजकल देशी संगीत का प्रचार है. भारत में देशी संगीत की दो पद्धतियाँ प्रचलित हैं-
१. हिन्दुस्तानी संगीत अथवा उत्तरी भारतीय संगीत.
२. कर्णाटक संगीत अथवा दक्षिणी भारतीय संगीत.

मार्गी संगीत : परिभाषा

प्राचीनकाल में संगीतज्ञों ने शास्त्रीय संगीत को दो विभागों में बाँट दिया-
१. मार्गी संगीत
२. देशी संगीत या गान

१. मार्गी संगीत - वैदिकयुग में ऋषियों ने जब देखा कि संगीत में मन को एकाग्र करने की अत्यंत प्रभावशाली शक्ति है, तभी से इस कला का प्रयोग परमेश्वर प्राप्ति के प्रमुख साधन के रूप में करने लगे.
'ॐ' शब्द में हीं उन्हें ब्रह्म-नाद की प्राप्ति होती दिख पड़ी. संगीत का उद्देश्य ब्रह्म-नाद को अनुभव करना था. इस संगीत को कड़े नियमों में बाँधने का प्रयत्न किया गया.

भरत मुनि ने इसी ''नियम-बद्ध संगीत को जो ईश्वर-प्राप्ति का साधन माना जाता है, मार्गी संगीत कह कर पुकारा.''

Wednesday, May 2, 2018

Sharma Musical Store One Bellow 39 Keys Female Reed Linden Wood Harmonium

Material: Wood Number of Keys: 39 Two side carry handles, jaali frame on keys There might be minor colour variation between actual product and image shown on screen due to lighting on the photography