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Friday, May 1, 2026

संगीत में नृत्य का महत्व

 संगीत और नृत्य एक दूसरे के पूरक हैं, और सदियों से ये दोनों कलाएं मानव सभ्यता का अभिन्न अंग रही हैं। संगीत की रचना में नृत्य का महत्व बहुआयामी है, जो न केवल संगीत के प्रदर्शन और प्रस्तुति को समृद्ध करता है, बल्कि संगीत की अवधारणा, संरचना और अभिव्यंजना को भी गहराई प्रदान करता है। संगीत में नृत्य के महत्व को निम्नलिखित बिंदुओं के आधार पर समझा जा सकता है:1.लय (Rhythm) और ताल (Beat) की अभिव्यक्ति:•नृत्य सीधे तौर पर संगीत की लय और ताल से जुड़ा होता है। नर्तक संगीत की लयबद्ध संरचना को अपने शारीरिक हाव-भाव, पद-संचलन और मुद्राओं के माध्यम से मूर्त रूप देते हैं।•यह संगीतकार को ताल की स्पष्टता और प्रभावशीलता को समझने में मदद करता है। नर्तक की गति संगीत की गति (tempo) को न केवल दर्शाती है, बल्कि उसे जीवंत भी करती है।•विभिन्न लयबद्ध पैटर्न (rhythmic patterns) और मेट्रिकल संरचनाएं (metrical structures) नृत्य के माध्यम से अधिक सहजता से समझी और अनुभव की जा सकती हैं।2.भाव (Emotion) और अभिव्यक्ति (Expression) का संवर्धन:•संगीत भावनाओं को व्यक्त करने का एक शक्तिशाली माध्यम है, और नृत्य इन भावनाओं को एक दृश्य और काइनेस्थेटिक (kinesthetic) आयाम प्रदान करता है।•नर्तक अपने चेहरे के हाव-भाव, शरीर की भाषा और आंदोलनों के माध्यम से संगीत में निहित आनंद, उदासी, क्रोध, या शांति जैसी भावनाओं को मुखर करते हैं।•यह संगीतकार को यह समझने में सहायता करता है कि उनके संगीत के कौन से अंश किन भावनाओं को सबसे प्रभावी ढंग से संप्रेषित कर रहे हैं, जिससे वे अपनी रचनाओं में भावनात्मक गहराई ला सकते हैं।3.संरचना (Structure) और रूप (Form) का दृश्यांकन:•संगीत की संरचना, जैसे कि विभिन्न खंडों (sections) का क्रम, पुनरावृति (repetition), और भिन्नता (variation), नृत्य के माध्यम से दृश्यात्मक रूप से प्रस्तुत की जा सकती है।•एक कोरियोग्राफी (choreography) संगीत के रूप (form) का अनुसरण कर सकती है, जिससे श्रोता (और नर्तक स्वयं) संगीत की संरचना को बेहतर ढंग से समझ पाते हैं।•उदाहरण के लिए, सूइट (suite) या सोनाटा (sonata) जैसे संगीत रूपों को नृत्य के विभिन्न हिस्सों के माध्यम से चित्रित किया जा सकता है।4.ध्वनि (Sound) और गति (Movement) का संश्लेषण:•संगीत ध्वनि की कला है और नृत्य गति की। जब ये दोनों कलाएं मिलती हैं, तो वे एक संवादात्मक (interactive) और समृद्ध कलात्मक अनुभव का निर्माण करती हैं।•नृत्य संगीत को एक दृश्य तत्व प्रदान करता है, जिससे यह अधिक आकर्षक और सुलभ हो जाता है।•यह संगीतकार को अपनी रचनाओं में ऐसे तत्व शामिल करने के लिए प्रेरित कर सकता है जो नृत्य के लिए अनुकूल हों, जिससे संगीत की समग्र प्रभावशीलता बढ़ जाती है।5.सांस्कृतिक और अनुष्ठानिक (Ritualistic) महत्व:•अनेक संस्कृतियों में, संगीत और नृत्य अनादि काल से धार्मिक अनुष्ठानों, सामाजिक समारोहों और लोक कथाओं का हिस्सा रहे हैं।•संगीत अक्सर नृत्य के लिए एक माध्यम या प्रेरणा के रूप में कार्य करता है, और ये दोनों मिलकर समुदाय की पहचान और मूल्यों को व्यक्त करते हैं।•बी.MUS के छात्र के रूप में, विभिन्न सांस्कृतिक संगीत परंपराओं का अध्ययन करते समय नृत्य की भूमिका को समझना महत्वपूर्ण है।6.प्रदर्शन (Performance) और प्रस्तुति (Presentation):•संगीत के कई रूप, विशेष रूप से बैले (ballet), ओपेरा (opera), और विभिन्न शास्त्रीय और लोक नृत्य शैलियाँ, स्वाभाविक रूप से नृत्य के साथ जुड़ी होती हैं।•नृत्य संगीत के प्रदर्शन को अधिक गतिशील और प्रभावशाली बना सकता है, और यह संगीतकारों के लिए अपने काम को प्रस्तुत करने का एक महत्वपूर्ण तरीका हो सकता है।7.अभ्यास (Practice) और शिक्षण (Pedagogy) में सहायक:•संगीत के छात्रों के लिए, लय, ताल और गति की अवधारणाओं को समझने के लिए नृत्य एक व्यावहारिक उपकरण हो सकता है।•वाद्ययंत्र बजाने या गायन का अभ्यास करते समय, शारीरिक गति (जैसे सिर हिलाना या पैर थपथपाना) संगीत की समझ को बढ़ा सकती है।•संगीत शिक्षा में, नृत्य का उपयोग बच्चों और वयस्कों दोनों में संगीत की समझ विकसित करने के लिए एक प्रभावी विधि के रूप में किया जा सकता है।

Rhythm and Beat

लय (Rhythm) और ताल (Beat)संगीत (B.Mus) के अध्ययन में, लय और ताल दो मौलिक तत्व हैं जो किसी भी संगीतिक रचना की संरचना और प्रवाह को परिभाषित करते हैं। ये दोनों आपस में गहराई से जुड़े हुए हैं, लेकिन इनके अपने विशिष्ट अर्थ और कार्य हैं।
लय (Rhythm)लय संगीत में ध्वनियों की अवधि और उनके समय के साथ वितरण को संदर्भित करती है। यह संगीतिक विचारों की वह श्रृंखला है जो समय के साथ प्रवाहित होती है। लय केवल मात्राओं (notes) और विरामों (rests) के निश्चित क्रम से कहीं अधिक है; यह उन विभिन्न अवधियों के बीच संबंध है जो संगीत को गति और जीवन प्रदान करती है।•अवधि (Duration): संगीतिक ध्वनियों (notes) और मौन (rests) की लंबाई को अवधि कहते हैं। ये विभिन्न अवधियों के संयोजन से ही लय का निर्माण होता है। उदाहरण के लिए, एक पूर्ण मात्रा (whole note), अर्ध मात्रा (half note), चतुर्थ मात्रा (quarter note), अष्टम मात्रा (eighth note) आदि विभिन्न अवधियों का प्रतिनिधित्व करती हैं।•लयबद्ध पैटर्न (Rhythmic Patterns): ये अवधियों के विशिष्ट संयोजन होते हैं जो संगीत के एक छोटे खंड में दोहराए जाते हैं या विकसित होते हैं। ये पैटर्न संगीत के चरित्र को बहुत प्रभावित करते हैं। उदाहरण के लिए, एक मार्च (march) का लयबद्ध पैटर्न एक वाल्ट्ज (waltz) के पैटर्न से बहुत अलग होगा।•टेम्पो (Tempo): लय सीधे तौर पर टेम्पो से संबंधित है, जो संगीत की गति को मापता है। एक धीमी गति (slow tempo) एक प्रकार की लय का अनुभव देगी, जबकि एक तेज गति (fast tempo) एक अलग लय का अनुभव देगी, भले ही मात्राओं का क्रम समान हो।
वाद्ययंत्र या स्वर-साधना के दौरान, वादक या गायक को नोटेशन में दी गई अवधियों का सटीक पालन करना होता है। मेट्रोनोम (Metronome) का उपयोग लय की स्थिरता और सटीकता बनाए रखने के लिए एक महत्वपूर्ण उपकरण है। विभिन्न लयबद्ध अभ्यास (rhythmic exercises), जैसे कि तालबद्ध खंडों का पाठ (recitation of rhythmic passages), लय की समझ और निष्पादन को बेहतर बनाने के लिए आवश्यक हैं।ताल (Beat)ताल संगीत में समय की एक नियमित, आवर्ती नाप है। यह वह स्थिर नाड़ी है जो संगीत को आगे बढ़ाती है। ताल एक आंतरिक घड़ी की तरह काम करती है, जो संगीतकारों और श्रोताओं को संगीत की प्रगति का अनुसरण करने में मदद करती है।•माप (Measure/Bar): संगीत को अक्सर माप या बार (bar) नामक छोटे, समान खंडों में विभाजित किया जाता है। प्रत्येक माप में निश्चित संख्या में ताल होती हैं।•समय हस्ताक्षर (Time Signature): समय हस्ताक्षर (जैसे 4/4, 3/4, 6/8) यह निर्धारित करता है कि प्रत्येक माप में कितनी ताल होंगी और कौन सी मात्रा (note value) एक एकल ताल का प्रतिनिधित्व करेगी।•ऊपरी अंक (Numerator): प्रत्येक माप में तालों की संख्या बताता है।•निचला अंक (Denominator): यह बताता है कि किस मात्रा (note value) को एक ताल माना जाएगा। उदाहरण के लिए, 4/4 समय हस्ताक्षर में, प्रत्येक माप में 4 ताल होती हैं, और एक चतुर्थ मात्रा (quarter note) एक ताल के बराबर होती है।•एक्सेंट (Accent): ताल के कुछ बीट्स पर जोर दिया जाता है, जिसे एक्सेंट कहते हैं। समय हस्ताक्षर अक्सर यह निर्धारित करते हैं कि कौन से बीट्स पर स्वाभाविक रूप से जोर दिया जाता है (जैसे 4/4 में पहले बीट पर)।
संगीतिक प्रदर्शन में ताल की सुदृढ़ भावना (strong sense of beat) सर्वोपरि है। वादक को संगीत के अंतर्निहित पल्स (underlying pulse) को महसूस करना चाहिए और उसे अपने प्रदर्शन में बनाए रखना चाहिए। ताल का अध्ययन शास्त्रीय और भारतीय शास्त्रीय संगीत में ताल प्रणालियों (tala systems) के माध्यम से किया जाता है, जहाँ जटिल लयबद्ध संरचनाएं विकसित की जाती हैं। भारतीय शास्त्रीय संगीत में, ताल केवल बीट्स का समूह नहीं है, बल्कि एक जटिल चक्र है जिसमें विभाग (divisions), ताली (claps) और खाली (khali) के साथ लयबद्ध पैटर्न का एक व्यवस्थित संगठन होता है।लय और ताल के बीच संबंध•ताल वह ढांचा (framework) प्रदान करती है जिसके भीतर लय घटित होती है। ताल एक समान प्रवाह प्रदान करती है, जबकि लय उस प्रवाह के भीतर अवधियों और पैटर्नों की विविधता लाती है।•लय ताल पर निर्मित होती है। एक लयबद्ध पैटर्न की प्रत्येक अवधि को ताल के सापेक्ष मापा जाता है।•ताल स्थिर होती है (आमतौर पर), जबकि लय परिवर्तनशील होती है। एक ही ताल के भीतर विभिन्न लयबद्ध पैटर्न हो सकते हैं।उदाहरण (भारतीय शास्त्रीय संगीत):•ताल: तीनताल (16 मात्राओं का एक चक्र, 4 विभाग, 3 ताली, 1 खाली)। यह एक निश्चित ढांचा प्रदान करती है।•लय: इस तीनताल के ढांचे के भीतर, एक गायक या वादक विभिन्न गतियाँ (जैसे विलंबित, मध्य, द्रुत) उत्पन्न कर सकता है। इसके अलावा, लयबद्ध आकृतियाँ (जैसे दुगुन - दोगुनी गति, तिगुन - तिगुनी गति) ताल के भीतर बनाई जा सकती हैं। ये आकृतियाँ लय का प्रतिनिधित्व करती हैं।संक्षेप में, ताल संगीत की धड़कन है, जबकि लय उस धड़कन के ऊपर और भीतर बुनी गई अवधियों की कलात्मक व्यवस्था है। B.Mus. छात्र के लिए, इन दोनों तत्वों की गहरी समझ और उन पर महारत हासिल करना संगीत की सैद्धांतिक समझ और व्यावहारिक निष्पादन दोनों के लिए अपरिहार्य है।

Friday, April 4, 2025

TU HAI TO DIL - LYRICS

Kᴏɪ ɴᴀʜɪ ᴍᴇʀᴀ, ᴢᴀʀᴏᴏʀᴀᴛ ᴛᴇʀɪ
Lᴀᴀɢᴇ ɴᴀ ᴊɪʏᴀ, ᴅᴇᴋʜᴜ ɴᴀ ᴊᴏ sᴏᴏʀᴀᴛ ᴛᴇʀɪ

Tᴜ ʜᴀɪ ᴛᴏʜ ᴅɪʟ ᴅʜᴀᴅᴀᴋᴛᴀ ʜᴀɪ, ᴛᴜ ʜᴀɪ ᴛᴏʜ sᴀᴀɴs ᴀᴀᴛɪ ʜᴀɪ
Tᴜ ɴᴀ ᴛᴏʜ ɢʜᴀʀ ɢʜᴀʀ ɴᴀʜɪ ʟᴀɢᴛᴀ, ᴛᴜ ʜᴀɪ ᴛᴏʜ ᴅᴀʀ ɴᴀʜɪ ʟᴀɢᴛᴀ
Tᴜ ʜᴀɪ ᴛᴏʜ ɢʜᴀᴍ ɴᴀ ᴀᴀᴛᴇ ʜᴀɪɴ, ᴛᴜ ʜᴀɪ ᴛᴏʜ ᴍᴜsᴋᴜʀᴀᴛᴇ ʜᴀɪɴ
Kᴇ ᴛᴇʀᴇ ʙɪɴ sᴏ ɴᴀʜɪ sᴀᴋᴛᴇ, ᴋɪsɪ ᴋᴇ ʜᴏ ɴᴀʜɪ sᴀᴋᴛᴇ
Tᴜ ʜᴀɪ ᴛᴏʜ…

Tᴜ ʜᴀɪ ᴛᴏʜ…

Tᴜᴊʜsᴇ ᴍᴇʀᴀ ᴊᴇᴇɴᴀ-ᴍᴀʀɴᴀ, ᴊᴀᴀɴ ᴛᴇʀᴇ ʜᴀᴀᴛʜ ᴍᴇɪɴ
100 ᴊᴀɴᴀᴍ ʙʜɪ ᴋᴀᴍ ᴋʏᴜɴ ʟᴀᴀɢᴇɪɴ, ʟᴀᴀɢᴇɪɴ ᴛᴇʀᴇ sᴀᴀᴛʜ ᴍᴇɪɴ?
Mᴀɪɴ ᴍᴜsᴀғɪʀ, ᴛᴜ ᴍᴜsᴀғɪʀ ɪs ᴍᴏʜᴀʙʙᴀᴛ ᴋᴇ sᴀғᴀʀ ᴍᴇɪɴ
Dᴏ ᴀᴋᴇʟᴇ ʀᴏʏᴇɪɴ ᴍɪʟ ᴋᴇ, ᴍɪʟ ᴋᴇ ᴅᴏɴᴏ ʀᴀʙ ᴋᴇ ɢʜᴀʀ ᴍᴇɪɴ
Sᴀᴀᴛʜ ᴛᴇʀᴇ ɴᴀ sᴀғᴀʀ, ᴡᴏ sᴀғᴀʀ ɴᴀʜɪ ʟᴀɢᴛᴀ

Tᴜ ʜᴀɪ ᴛᴏʜ ᴅɪʟ ᴅʜᴀᴅᴀᴋᴛᴀ ʜᴀɪ, ᴛᴜ ʜᴀɪ ᴛᴏʜ sᴀᴀɴs ᴀᴀᴛɪ ʜᴀɪ
Tᴜ ɴᴀ ᴛᴏʜ ɢʜᴀʀ ɢʜᴀʀ ɴᴀʜɪ ʟᴀɢᴛᴀ, ᴛᴜ ʜᴀɪ ᴛᴏʜ ᴅᴀʀ ɴᴀʜɪ ʟᴀɢᴛᴀ
Tᴜ ʜᴀɪ ᴛᴏʜ ɢʜᴀᴍ ɴᴀ ᴀᴀᴛᴇ ʜᴀɪɴ, ᴛᴜ ʜᴀɪ ᴛᴏʜ ᴍᴜsᴋᴜʀᴀᴛᴇ ʜᴀɪɴ
Kᴇ ᴛᴇʀᴇ ʙɪɴ sᴏ ɴᴀʜɪ sᴀᴋᴛᴇ, ᴋɪsɪ ᴋᴇ ʜᴏ ɴᴀʜɪ sᴀᴋᴛᴇ
Tᴜ ʜᴀɪ ᴛᴏʜ…

Hᴀɪ ᴀɢᴀʀ ʏᴇ ᴋʜᴡᴀᴀʙ ᴛᴏʜ ᴘʜɪʀ ɴᴇᴇɴᴅ ɴᴀ ᴛᴏᴏᴛᴇ ᴋᴀʙʜɪ
Sᴀᴀɴs ᴄʜʜᴏᴏᴛᴇ ʜᴀᴀᴛʜ sᴇ, ᴘᴀʀ ʜᴀᴀᴛʜ ɴᴀ ᴄʜʜᴏᴏᴛᴇ ᴋᴀʙʜɪ
Mᴀɪɴ ɴᴀᴀsᴀᴍᴀᴊʜ-ɴᴀᴅᴀᴀɴ ʜᴏᴏɴ, ᴀᴀ ᴋᴇ ᴍᴜᴊʜᴋᴏ ᴛʜᴀᴀᴍ ʟᴇ
Lᴀᴀɢᴇ ᴍᴜᴊʜᴋᴏ ʀᴀʙ ʙᴜʟᴀᴀʏᴇ, ᴊᴀʙ ᴛᴜ ᴍᴇʀᴀ ɴᴀᴀᴍ ʟᴇ
Tᴜ sᴀᴍᴀɴᴅᴀʀ ɢᴇʜʀᴀ ʜᴀɪ, sᴀᴀɢᴀʀ ɴᴀʜɪ ʟᴀɢᴛᴀ

Tᴜ ʜᴀɪ ᴛᴏʜ ᴅɪʟ ᴅʜᴀᴅᴀᴋᴛᴀ ʜᴀɪ, ᴛᴜ ʜᴀɪ ᴛᴏʜ sᴀᴀɴs ᴀᴀᴛɪ ʜᴀɪ
Tᴜ ɴᴀ ᴛᴏʜ ɢʜᴀʀ ɢʜᴀʀ ɴᴀʜɪ ʟᴀɢᴛᴀ, ᴛᴜ ʜᴀɪ ᴛᴏʜ ᴅᴀʀ ɴᴀʜɪ ʟᴀɢᴛᴀ
Tᴜ ʜᴀɪ ᴛᴏʜ ɢʜᴀᴍ ɴᴀ ᴀᴀᴛᴇ ʜᴀɪɴ, ᴛᴜ ʜᴀɪ ᴛᴏʜ ᴍᴜsᴋᴜʀᴀᴛᴇ ʜᴀɪɴ
Kᴇ ᴛᴇʀᴇ ʙɪɴ sᴏ ɴᴀʜɪ sᴀᴋᴛᴇ, ᴋɪsɪ ᴋᴇ ʜᴏ ɴᴀʜɪ sᴀᴋᴛᴇ
Tᴜ ʜᴀɪ ᴛᴏʜ…

Tᴜ ʜᴀɪ ᴛᴏʜ…

Sunday, January 5, 2025

Aakarsh - Sulat Prahar

 आकर्ष या सुलट प्रहार:

Apkarsh or Ulat Prahar

 अपकर्ष या उलट प्रहार :

Bol in Sitar

बोल (सितार वादन में )

सितार वादन मिज़राब द्वारा होता है. अतएव मिजराब प्रहार से उत्पन्न होने वाली विभिन्न ध्वनियों को बोल कहते हैं. मुख्य बोल दो होते हैं - 'दा ' और 'रा '. दा और  रा को दुगुन ले में क्रम से दारा बजाते हैं. तो वह दिर कहलाता है. प्रायः दा , रा और दिर इन्हीं तीन बोलों पर सितार का सम्पूर्ण बाज निर्भर होता है।  इन्हीं तीन बोलों से अन्य अनेक बोल बना लिए जाते हैं जैसे : दार, द्रा, द्रार्दा, दिर दिर, दार दार ददार, दरार आदि। 

Wednesday, April 29, 2020

राग सुर मल्हार का परिचय

वादी: 
संवादी: सा
थाट: KAFI
आरोह: सारेमपनिसां
अवरोह: सांनि॒प मपनि॒धप मरेऩिसा
पकड़: सारेप मनि॒मप नि॒धपम रेसा
रागांग: उत्तरांग
जाति: AUDAV-SHADAV
समय: दिन का द्वितीय प्रहर
विशेष: न्यास-सा म प। यह मल्हार का एक प्रकार है। आरोह में नि और अवरोह में नि॒ का प्रयोग होता है। सारंग से बचने केलिये ध का प्रयोग। सदृश-वृन्दावनी सारंग, सोरठ, सामंत।

राग दुर्गा का परिचय

वादी: 
संवादी: रे
थाट: BILAWAL
आरोह: सारेमपधसां
अवरोह: सांधपमरेसा
पकड़: मपध म रेपम रेधसा
रागांग: उत्तरांग
जाति: AUDAV-AUDAV
समय: रात्रि का द्वितीय प्रहर
विशेष: कर्नाटिक संगीत में यह शुद्धसावेरी नाम से प्रचलित है। वर्जित-ग नि। कुछ लोग vadi-M samvadi-S मानते हैं। इसमें धम रेप रेध की संगति विशेष है।

राग शुद्ध सारंग का परिचय

वादी: रे
संवादी: 
थाट: KALYAN
आरोह: निसारेम॓प धम॓पनिसां
अवरोह: सांनिधपम॓प मरेसा
पकड़: रेम॓प म-रे साऩिध़सा ऩिरेसा
रागांग: पूर्वांग
जाति: SHADAV-SHADAV
समय: दिन का द्वितीय प्रहर
विशेष: न्यास - रे प नि यह सारंग का प्रकार है। इसमें अवरोह में दोनो मध्यम लगते हैं। स्वर-विस्तार मन्द्र और मध्य में होता है।

राग चन्द्रकौंस का परिचय

वादी: 
संवादी: सा
थाट: BHAIRAVI
आरोह: साग॒मध॒निसां
अवरोह: सांनिध॒मग॒मग॒सा
पकड़: ग॒म ग॒सानिसा
रागांग: पूर्वांग
जाति: AUDAV-AUDAV
समय: रात्रि का द्वितीय प्रहर
विशेष: न्यास- ग॒ म नि। वर्जित-आरोह में रे प। मालकोश में नि शुद्ध लगाने से चन्द्रकोश होता है। इससे बचने के लिये शुद्ध नि का बारंबार प्रयोग होता है। तीनो सप्तक में विस्तार किया जाता है।

राग भटियार का परिचय

वादी: 
संवादी: सा
थाट: MARWA
आरोह: सानिधनिपम पग म॓धसां
अवरोह: सांध धप धनिपम पग म॓गरेसा
पकड़: धपम पग रे॒सा
रागांग: पूर्वांग
जाति: SAMPURN-SAMPURN
समय: रात्रि का तृतीय प्रहर
विशेष: न्यास-सा म प। अल्पत्व-म॓। यह मांड( धमपग) एवं भंखार (पगरे॒सा) का मिश्रण है। दोनो से बचाव के लिये साम,पध का प्रयोग। चलन वक्र। पगरे॒सा से इस राग का स्वरूप व्यक्त होता है।

राग जैतश्री का परिचय

वादी: 
संवादी: नि
थाट: PURVI
आरोह: सागम॓पनिसां
अवरोह: सानिध॒पम॓गम॓गरे॒सा
पकड़: पध॒प म॓गम॓गरे॒सा
रागांग: उत्तरांग
जाति: AUDAV-SAMPURN
समय: रात्रि का प्रथम प्रहर
विशेष: न्यास-ग प वर्जित - आरोह में ऋषभ धैवत पूर्वांग में जैत और उत्तरांग में श्री राग व्यक्त होता है।

Monday, April 27, 2020

राग बिहाग का परिचय

वादी: 
संवादी: नि
थाट: BILAWAL
आरोह: ऩिसागमपनिसां
अवरोह: सांनिधप म॓पगमग रेसा
पकड़: पम॓गमग रेसा
रागांग: उत्तरांग
जाति: AUDAV-SAMPURN
समय: रात्रि का प्रथम प्रहर
विशेष: सदृश- यमन कल्याण। तीनो सप्तक में चलन। विवादी-म॓; वर्जित- आरोह में रे ध;

Sunday, April 26, 2020

राग कलिंगड़ा का परिचय

वादी: 
संवादी: सा
थाट: BHAIRAV
आरोह: सारे॒गम पध॒निसां
अवरोह: सांनिध॒प मगरे॒सा
पकड़: ध॒प गमग ऩि सारे॒ग म
रागांग: पूर्वांग
जाति: SAMPURN-SAMPURN
समय: रात्रि का तृतीय प्रहर
विशेष: ऋषभ एवं धैवत पर कम आन्दोलन। न्यास- सा ग प।

Friday, April 24, 2020

कंपन की परिभाषा

द्रुतार्धमान वेगेन कम्पितं गमकं विदुः। 
अर्थात द्रुतलय की आधी गति से कम्पन होने से कम्पित स्वर माना जाता है जिसे गामक भी कहते हैं।

स्वरों को हिलाने से कम्पन होता है।  सितार में जिस स्वर का कम्पन करना हो, उस स्वर के परदे पर बाएं हाथ की अंगुली (मध्यमा या तर्जनी) से तार को दबा कर दाहिने हाथ की तर्जनी से तर को मिजराब से ठोंक कर फिर हलके-हलके बाएं हाथ की अंगुली को हिलाने से जो स्वर उत्पन्न होता है, उसे कम्पन कहते हैं।  यह एक प्रकार का Gamak गमक है।

श्रुति की परिभाषा

नित्यम् गितोपयोगित्वंभिज्ञेयत्वमप्युत। 
लक्ष्यविद्भिः समादिष्टं पर्याप्तं श्रुतिलक्ष्नम्।।  

जो सदा संगितोपयोगी तथा स्पष्ट पहचानने योग्य हो उसको हिन् गुणीजन श्रुति कहते हैं।  संगीत शास्त्रकारों ने संगीतोपयोगी नाद से अपने उपयोग के लिए निम्नलिखित बाइस श्रुतियों का चुनाव किया है:-

  1. तीव्रा
  2. कुमुद्वती 
  3. मंदा 
  4. छंदोवती 
  5. दयावती 
  6. रंजनी 
  7. रक्तिका 
  8. रौद्री 
  9. क्रोधी 
  10. वज्रिका 
  11. प्रसारिणी 
  12. प्रीति 
  13. माजनी 
  14. क्षिति 
  15. रक्ता 
  16. संदीपनी 
  17. आलापिनी 
  18. मदन्ती 
  19. रोहिणी 
  20. रम्या 
  21. उग्रा 
  22. क्षोभिणी 

राग केदार का परिचय

वादी: 
संवादी: सा
थाट: KALYAN
आरोह: साम मप धप निध सां
अवरोह: सां निधप म॓पधपम रेसा
पकड़: साम मप धपम रेसा
रागांग: उत्तरांग
जाति: AUDAV-SHADAV
समय: रात्रि का प्रथम प्रहर
विशेष: कभी-कभी दोनो मध्यम का प्रयोग मींड द्वारा किया जाना अच्छा लगता है।

राग तिलक कामोद का परिचय

वादी: सा
संवादी: 
थाट: KHAMAJ
आरोह: सारेगसा रेमपधमपसां
अवरोह: सांपधमग सारेग साऩि
पकड़: रेपमग सारेग साऩि
रागांग: पूर्वांग
जाति: SHADAV-SAMPURN
समय: रात्रि का द्वितीय प्रहर
विशेष: सदृश-देश, सोरठ। मध्य सप्तक के नि के बिना भी इस राग को दिखाया जा सकता है । अनुवादी होते हुये भी नि॒ का प्रयोग कभी-कभी वक्र रूप में हीं होता है।

Thursday, April 23, 2020

राग बागेश्री का परिचय

वादी: 
संवादी: सा
थाट: KAFI
आरोह: साऩि॒ध़ऩि॒सा मग॒ मधनि॒सां
अवरोह: सांनि॒ध मग॒ मग॒मरेसा
पकड़: ऩि॒ध़सा मधनि॒ध मग॒रेसा
रागांग: पूर्वांग
जाति: AUDAV-SAMPURN
समय: रात्रि का द्वितीय प्रहर
विशेष: न्यास-सा ग॒ म ध। आरोह में पंचम का अल्प प्रयोग होता है। 

राग पीलू का परिचय

वादी: ग॒
संवादी: नि
थाट: KAFI
आरोह: ऩिसागमपनि
अवरोह: सांनि॒धपग॒ रेसा
पकड़: ऩिसाग॒ ऩिसा प़ध़॒ऩिसा
रागांग: पूर्वांग
जाति: AUDAV-SAMPURN
समय: दिन का तृतीय प्रहर
विशेष: सप्तक के बारहो स्वरों का प्रयोग होता है। उभय ऋषभ गन्धार निषाद का उपयोग।